नाट्य संस्था अष्टंरंग की अप्रतिम प्रस्तुति के साथ , 21 वीं सानंद नाट्य स्पर्धा का शुभारंभ
नवीन मौर्य
नित्य संदेश, इंदौर। पहली प्रस्तुति इंदौर की नाट्य संस्था अष्टंरंग की थी। अष्टरंग ने वरिष्ठ रंग कर्मी अनिल चापेकर के अभिनय और दिग्दर्शन में प्रभाकर लक्ष्मण मयेकर द्वारा लिखित मराठी नाटक अग्निपंख का अप्रतिम मंचन किया।
सबसे पहले सानंद मराठी नाटक नाट्यस्पर्धा 2026 का उद्घाटन IIST के श्री अरुण एस भटनागर एवं रेखास्वरूप भटनागर ने दीप प्रचलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया ।
अतिथि स्वागत किया सानंद ने उसके अध्यक्ष श्री जयंत भिसे, अश्विन पळशीकर, अनिरुद्ध नागपुरकर, सानंद मित्र कुमारी श्रेया देशमुख ने । कार्यक्रम का सुंदर सूत्र संचालन किया सानंद मित्र कुमारी पूर्वी केळकर एवं श्री अर्पित बापट ने ।
दरअसल, 'अग्निपंख' केवल एक पारिवारिक कथा नहीं, बल्कि स्वतंत्रता-प्राप्ति के दौर में भारतीय समाज में घटित वैचारिक और सामाजिक परिवर्तन का प्रभावशाली दस्तावेज है। 1980 के दशक में रंगमंच पर आए इस नाटक की कथा 15 अगस्त 1947 से लेकर 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या तक के कालखंड में घटित होती है। यह वह समय था जब सामंती और जातिगत वर्चस्व का सामना समानता, लोकतंत्र और आधुनिक मूल्यों से हो रहा था। नाटक इसी टकराव को अपनी मूल संवेदना बनाता है।
कहानी एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण जमींदार परिवार की है, जिसकी वास्तविक बागडोर बाईसाहेब के हाथों में है। वे परंपरा, अनुशासन और सामाजिक प्रतिष्ठा की प्रतीक हैं, जबकि उनके पति रावसाहेब विलासी जीवन में रमे हुए हैं। परिवार की नई पीढ़ी बदलते समय का प्रतिनिधित्व करती है,पुत्र का अंतर्जातीय विवाह और पुत्री का एक मराठा युवक से प्रेम बाईसाहेब के स्थापित मूल्यों को चुनौती देते हैं। यहीं से नाटक का वैचारिक संघर्ष तीव्र होता है।
मयेकर की सबसे बड़ी सफलता यह है कि वे किसी पात्र को नायक या खलनायक नहीं बनाते। बाईसाहेब परिवर्तन का विरोध करती हैं, लेकिन उनका प्रतिरोध उस व्यवस्था से उपजा है, जिसमें उन्होंने जीवनभर विश्वास किया। दूसरी ओर नई पीढ़ी आधुनिक भारत की नई चेतना का प्रतिनिधित्व करती है। लेखक दोनों पक्षों के साथ न्याय करते हैं और नाटक को वैचारिक होने के बावजूद एकांगी नहीं बनने देते।
नाटक का चरम गांधीजी की हत्या के बाद भड़के ब्राह्मण-विरोधी दंगों में आता है। जलती हुई हवेली केवल एक परिवार के पतन का नहीं, बल्कि एक युग के अंत का प्रतीक बन जाती है। अंतिम दृश्य में बाईसाहेब और रावसाहेब का विनाश के बीच भी फीनिक्स पक्षी की तरह पुनर्जन्म की संभावना में विश्वास व्यक्त करना नाटक को गहरी प्रतीकात्मक ऊंचाई देता है।
रंगमंचीय दृष्टि से 'अग्निपंख' अत्यंत प्रभावशाली है
हवेली का नेपथ्य, समयानुकूल वेशभूषा और पात्रों की सशक्त कास्टिंग इसकी सफलता के प्रमुख आधार हैं। विशेष रूप से बाईसाहेब का चरित्र पूरे नाटक की आत्मा है, जबकि रावसाहेब और आधुनिक विचारों वाली बहू कथानक को मानवीय संवेदना और वैचारिक संतुलन प्रदान करते हैं।
'अग्निपंख' की सबसे बड़ी विशेषता इसका संतुलित दृष्टिकोण है। इसमें सामाजिक आलोचना है, पर कटुता नहीं; परिवर्तन का आग्रह है, पर परंपरा का उपहास नहीं। यही कारण है कि यह नाटक आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है, क्योंकि यह हमें सिखाता है कि समाज का विकास संघर्ष से नहीं, बल्कि संवाद, आत्ममंथन और परिवर्तन को स्वीकार करने की क्षमता से होता है। अनिल चापेकर का निर्देशन बेहद कसा हुआ और तेज गति का है। नाटक दर्शकों को बांधे रखता है। प्रकाश योजना, स्टेज क्राफ्ट और संगीत बेहद प्रभावी हैं। इसके लिए चेतन पेंढारकर, नवीन धोडपकर और मिलिंद देशपांडे की प्रशंसा की जानी चाहिए।
कलाकार -अनिल चापेकर, कुमार जड्ये, अक्षत राव, शंतनु ग्वाल्हेरकर, सौ. नेहा झारे, पुनिती अहिरशिंगे, विपुला देशपांडे श्रीवास्तव, अमित कजगीकर
क्रू टीम -लेखक - प्रभाकर लक्ष्मण मयेकर
दिग्दर्शक - अनिल चापेकर
ध्वनि संकलन..चेतन पांढारकर
ध्वनि सहायक ..संदीप सरवटे
रंगभूषा योजना..राजीव बागदरे
वेषभूषा योजना...उल्हास देव
नेपथ्य योजना...मिलिंद देशपांडे
प्रकाश योजना...नवीन धोडपकर


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