नित्य संदेश ब्यूरो
नोएडा। टाकेडा बायोफार्मास्युटिकल्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने आज घोषणा की कि भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल ने न्यू ड्रग्स एंड क्लीनिकल ट्रायल्स नियम, 2019 के सीटी-20 प्रावधान के अंतर्गत 4 से 60 वर्ष आयु के लोगों में डेंगू की रोकथाम के लिए कंपनी की डेंगू वैक्सीन क्यूडेंगा को बाजार में उतारने की मंजूरी प्रदान कर दी है। क्यूडेंगा भारत में मंजूरी पाने वाली पहली डेंगू वैक्सीन है। पहले डेंगू संक्रमण हो चुका हो या नहीं, दोनों ही परिस्थितियों में इसे लगाया जा सकता है और इसके लिए टीकाकरण से पहले किसी जांच की आवश्यकता नहीं होती। भारत में डेंगू अब भी एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है और क्यूडेंगा को मिली यह मंजूरी भारत में डेंगू की रोकथाम को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
इंटरकॉन्टिनेंटल मार्केट्स के प्रमुख डॉ. महेंद्र नायक ने कहा डेंगू एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है जो
लगातार बढ़ती जा रही है और भारत को इससे निपटने के लिए रोकथाम की वैज्ञानिक
प्रमाणों पर आधारित और दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता है। क्यूडेंगा के सात वर्षों
के नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि यह वैक्सीन डेंगू संक्रमण और डेंगू के कारण अस्पताल
में भर्ती होने के जोखिम से लगातार सुरक्षा प्रदान करती है और यह डेंगू के सभी
चारों वायरस सीरोटाइप पर प्रभावी है। यह समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक
महत्वपूर्ण उपलब्धि है। 2022 में लॉन्चिंग के बाद से क्यूडेंगा को 43 देशों में मंजूरी मिल चुकी है और दुनियाभर में इसकी 3.2 करोड़ से अधिक
डोज वितरित की जा चुकी हैं। भारत में मिली यह मंजूरी डेंगू की रोकथाम को मजबूत करने
की दिशा में एक अहम कदम है। अपनी 245 वर्षों की विरासत और
वैक्सीन के विकास में 70 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ टाकेडा सार्वजनिक
स्वास्थ्य प्राधिकरणों, हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स और अन्य साझेदारों के साथ
मिलकर इस वैक्सीन की सतत उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
साउथईस्ट एशिया एंड इंडिया क्लस्टर के जनरल
मैनेजर पीटर स्ट्राइबल ने कहा डेंगू सिर्फ किसी एक देश की समस्या नहीं है, बल्कि यह इस
पूरे क्षेत्र के सामने मौजूद एक साझा चुनौती है, जिससे निपटने के लिए सीमाओं से परे जाते हुए सहयोग
की जरूरत है। टाकेडा दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में सरकारों, सार्वजनिक
स्वास्थ्य एजेंसियों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और अन्य साझेदारों के साथ मिलकर काम
करने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारा उद्देश्य केवल क्यूडेंगा को मंजूरी दे चुके या
इसे रिकमेंड कर चुके देशों में इसकी उपलब्धता सुनिश्चित करना ही नहीं, बल्कि डेंगू की रोकथाम के लिए निगरानी प्रणाली, जन-जागरूकता, मच्छर नियंत्रण और सामुदायिक भागीदारी जैसे
व्यापक प्रयासों को भी मजबूत करना है। हमारा प्रयास प्रत्येक देश की जरूरतों के
अनुरूप टिकाऊ और वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित समाधान उपलब्ध कराने में योगदान
देना है।
साउथईस्ट एशिया एंड इंडिया क्लस्टर के मेडिकल
अफेयर्स प्रमुख डॉ. गोह चू बेंग ने कहा भारत में डेंगू का दबाव बहुत ज्यादा है और देश के कई
क्षेत्रों में डेंगू वायरस के सभी चारों सीरोटाइप एक साथ सक्रिय पाए गए हैं। क्यूडेंगा
को इन चारों सीरोटाइप से सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। पहले
डेंगू संक्रमण हुआ हो या नहीं, दोनों ही परिस्थितियों में इसे लगाया जा सकता है। इसकी
मंजूरी भारत में डेंगू की रोकथाम के लिए अपनाई जा रही समग्र रणनीति को और मजबूत करेगी।
वेक्टर कंट्रोल, सर्विलांस, जागरूकता और
अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य उपाय इस रणनीति का हिस्सा हैं।
डेंगू मच्छरों के जरिये फैलने वाला एक वायरल रोग है, जो दुनिया के 125 से अधिक देशों में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है।
वैश्विक स्तर पर डेंगू के कुल मामलों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा अकेले भारत में है।
वर्ष 2025
में भारत में डेंगू के 1.13 लाख से अधिक
मामले दर्ज किए गए थे, हालांकि मॉडलिंग स्टडीज से संकेत मिलता है कि
वास्तविक संक्रमणों की संख्या दर्ज मामलों से कहीं अधिक है और हर वर्ष संभवतः
करोड़ों लोग इससे संक्रमित हो जाते हैं।
भारत में हर वर्ष लाखों लोगों पर डेंगू का खतरा रहता है। देश के अनेक हिस्सों
में डेंगू का व्यापक प्रसार (एंडेमिक), तेजी से हो रहा शहरीकरण और मच्छरों की संख्या
बढ़ाने में मददगार जलवायु संबंधी कारक इस खतरे के प्रमुख कारण हैं। यही वजह है कि
डेंगू अब केवल मौसमी बीमारी नहीं है, बल्कि इसका संक्रमण सालभर सार्वजनिक स्वास्थ्य
के लिए चुनौती बना रहता है। किसी मौसम में संक्रमण के मामले अचानक बढ़ने से स्वास्थ्य
सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। डेंगू का इलाज भी जटिल है, क्योंकि इसके लिए कोई विशेष दवा उपलब्ध नहीं है। कई मामलों
में इसका संक्रमण तेजी से गंभीर और जानलेवा रूप ले लेता है, जिससे मरीज को अस्पताल में भर्ती करने और आईसीयू में रखने
की जरूरत पड़ जाती है।
भारत में मिली यह मंजूरी टाकेडा के वैश्विक
क्लीनिकल डेवलपमेंट कार्यक्रम के नतीजों पर आधारित है। इस कार्यक्रम के तहत फेज-1, फेज-2 और फेज-3 के कुल 19 क्लीनिकल
परीक्षण किए गए, जिनमें
डेंगू-प्रभावित (एंडेमिक) और गैर-प्रभावित (नॉन-एंडेमिक) क्षेत्रों के 28,000 से अधिक लोगों को
शामिल किया गया। इन परीक्षणों में सबसे महत्वपूर्ण फेज-3 टाइड्स अध्ययन था, जिसमें आठ देशों के
20,000 से अधिक प्रतिभागियों पर वैक्सीन का
मूल्यांकन किया गया। इस अध्ययन का उद्देश्य लंबे समय तक क्यूडेंगा की सेफ्टी और
एफिकेसी को जांचना था।
दूसरी खुराक दिए जाने के 12 महीने बाद
अध्ययन अपने प्राइमरी एंडपॉइंट तक पहुंचा। नतीजों के अनुसार, वायरोलॉजिकली
कंफर्म्ड डेंगू – वीसीडी के खिलाफ वैक्सीन की प्रभावशीलता (एफिकेसी) 80.2
प्रतिशत रही। दूसरी
खुराक के 18 महीने बाद, अध्ययन में यह भी पाया गया कि डेंगू के कारण अस्पताल में
भर्ती होने के जोखिम को रोकने में क्यूडेंगा की प्रभावशीलता 90.4
प्रतिशत रही। इस प्रकार
अध्ययन का एक महत्वपूर्ण सेकेंडरी एंडपॉइंट भी सफलतापूर्वक पूरा हुआ। अध्ययन के 4.5 वर्ष पूरे होने पर
प्राप्त आंकड़ों से पता चला कि क्यूडेंगा की दो खुराकें डेंगू के कारण अस्पताल में
भर्ती होने के जोखिम को रोकने में 84.1 प्रतिशत प्रभावी रहीं। विशेष रूप से, उपलब्ध सात वर्षों के आंकड़े यह भी दर्शाते हैं
कि यह वैक्सीन डेंगू वायरस के सभी चारों सीरोटाइप के खिलाफ सात वर्ष तक लगातार सुरक्षित और प्रभावी बनी रही।
भारत में क्यूडेंगा को मंजूरी मिलने में यहां
किए गए फेज-3 क्लीनिकल ट्रायल के आंकड़ों का भी योगदान है। इस अध्ययन में
4 से 60 वर्ष आयु वर्ग
के भारतीय प्रतिभागियों में वैक्सीन की सेफ्टी और इम्यूनोजेनेसिटी का मूल्यांकन किया गया। अध्ययन
में पाया गया कि स्वस्थ वयस्कों, किशोरों और बच्चों ने आसानी से क्यूडेंगा को टॉलरेट किया।
सभी में यह वैक्सीन सुरक्षित रही और प्रभावी रूप से इम्यूनोजेनिक रही। इन क्लीनिकल
नतीजों को वास्तविक परिस्थितियों से प्राप्त आंकड़ों और लगातार जारी
फार्माकोविजिलेंस से भी समर्थन मिला है। इनके माध्यम से वैक्सीन की सुरक्षा और
उसके प्रभाव को लेकर समझ लगातार मजबूत हो रही है।
क्यूडेंगा एक टेट्रावैलेंट (चारों सीरोटाइप के विरुद्ध), जीवित लेकिन
कमजोर किए गए वायरस पर आधारित वैक्सीन है, जिसे डेंगू वायरस के चारों सीरोटाइप से सुरक्षा
प्रदान करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। यह वैक्सीन 0.5 मिलीलीटर की
मात्रा में त्वचा के नीचे (सबक्यूटेनस) लगाई जाती है। इसका टीकाकरण दो खुराकों में पूरा होता
है और दोनों खुराकों के बीच तीन महीने का अंतर रखा जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने डेंगू-प्रभावित
क्षेत्रों में क्यूडेंगा के उपयोग की सिफारिश की है। संगठन ने उच्च संक्रमण वाले
क्षेत्रों में सार्वजनिक टीकाकरण कार्यक्रमों में इसे शामिल किए जाने का भी समर्थन
किया है। इसकी विशेष बात यह है कि इसे लगाने से पहले किसी प्रकार की प्री-वैक्सीनेशन
स्क्रीनिंग कराने की
आवश्यकता नहीं होती। क्यूडेंगा को डब्ल्यूएचओ प्रीक्वालिफिकेशन भी प्राप्त है।
इसका अर्थ है कि यह गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता के अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरी
उतरी है। इसीलिए इसे यूनिसेफ और पैन अमेरिकन हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (पीएएचओ) जैसी
अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां खरीद सकती हैं और आपूर्ति कर सकती हैं, जिससे दुनिया के अधिक से अधिक देशों तक इसकी पहुंच सुनिश्चित करने में मदद
मिलेगी।
भारत सहित एशिया, लैटिन अमेरिका और यूरोप के 43 देशों में क्यूडेंगा को
मंजूरी मिल चुकी है। अब तक सार्वजनिक और निजी टीकाकरण कार्यक्रमों के माध्यम से
इसकी 3.2 करोड़ से अधिक डोज वितरित की जा चुकी हैं। ब्राजील के राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में इस वैक्सीन को
शामिल किया गया है। इसके अलावा अर्जेंटीना, कोलंबिया और इंडोनेशिया में भी यह सार्वजनिक
टीकाकरण कार्यक्रमों के माध्यम से उपलब्ध कराई जा रही है।
डीसीजीआई से मंजूरी मिलने के बाद टाकेडा भारतीय
नियामक प्राधिकरणों, सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न हितधारकों और
स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के साथ मिलकर काम करना जारी रखेगी, ताकि भारत में
क्यूडेंगा की प्लानिंग, डिलीवरी और उपलब्धता को प्रभावी ढंग से आगे
बढ़ाया जा सके।

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