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Friday, June 19, 2026

दिनेश कुमार वशिष्ठ ने समाज से जो लिया था, उसे समाज को लौटा दिया : प्रो. असलम जमशेदपुरी



उर्दू विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में स्वर्गीय श्री दिनेश कुमार वशिष्ठ की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन

नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। यह अत्यंत दुख और अफसोस की बात है कि आज हम दिनेश कुमार की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा आयोजित कर रहे हैं। कल तक वे हमारे बीच थे। उनकी बातें, उनकी यादें आज भी हमारे साथ हैं। ऐसा महसूस होता है मानो वे अभी हमारे बीच आ जाएंगे। मैं उनके साहस और हौसले को सलाम करता हूँ। उन्होंने जीवन की कठिनाइयों का मुस्कुराकर सामना किया और एक सार्थक एवं पूर्ण जीवन जिया। उनके भीतर जो दृढ़ता और साहस था, वह बहुत कम लोगों में देखने को मिलता है। यही साहस उन्होंने अपनी पत्नी और बेटी में भी पैदा किया। वे अपनी बेटी से बहुत प्रेम करते थे और उसके साथ एक घनिष्ठ मित्र की तरह रहते थे। ये विचार उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. असलम जमशेदपुरी ने उर्दू विभाग के प्रेमचंद सेमिनार हॉल में आयोजित “स्वर्गीय दिनेश कुमार वशिष्ठ की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा” में व्यक्त किए। 

उन्होंने आगे कहा कि दिनेश कुमार वशिष्ठ ने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण सार्थक ढंग से जिया। बीमारी के दौरान भी वे स्कूटर से विभाग आते रहे। उन्हें विभाग से विशेष लगाव था। उन्होंने अनेक प्रकार के कार्य किए और एक अच्छे चिकित्सक भी थे। उन्होंने समाज से जो कुछ प्राप्त किया था, उसे समाज को वापस लौटा दिया। उन्होंने अपनी पत्नी और बेटी को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उनका मानना था कि मनुष्य को सदैव अच्छा कार्य करना चाहिए। उनका निधन केवल डॉ. अलका वशिष्ठ का ही नहीं, बल्कि हम सभी का व्यक्तिगत नुकसान है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। कार्यक्रम का शुभारंभ फारूक शेरवानी द्वारा पवित्र कुरआन के पाठ से हुआ तथा संचालन डॉ. इरशाद सियानवी ने किया। इस अवसर पर प्रसिद्ध कलाकार अनिल शर्मा ने कहा कि दिनेश कुमार वशिष्ठ जी के निधन से मैं अत्यंत दुखी हूँ। इस दुख की घड़ी में मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। डॉ. अलका वशिष्ठ ने अपने पति की तन-मन से सेवा की। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे तथा अलका जी और उनकी बेटी को इस दुख को सहने की शक्ति दे।

प्रख्यात कलाकार भारत भूषण शर्मा ने कहा कि यह एक शाश्वत सत्य है कि जो इस संसार में आया है, उसे एक दिन जाना ही है। हम डॉ. अलका वशिष्ठ के दुख का अनुमान लगा सकते हैं। जब भी मेरी दिनेश वशिष्ठ जी से मुलाकात हुई, मैंने उन्हें विनम्र, सौम्य और सच्चे इंसान के रूप में पाया। वे अत्यंत ईमानदार और नेकदिल व्यक्ति थे। शुभ्रा वशिष्ठ ने कहा कि मैं उन सभी लोगों का धन्यवाद करती हूँ जो मेरे पापा को श्रद्धांजलि देने के लिए यहां आए हैं। मेरे पापा मेरी ताकत थे। अब ऐसा लगता है कि हम सब कुछ हार चुके हैं। उनके बिना जीवन में जो खालीपन आया है, वह हमेशा बना रहेगा। मैं पूरी कोशिश करूंगी कि अपने पापा के सपनों को साकार कर सकूं।

आफाक अहमद खान ने कहा कि जब कोई अपना बिछड़ जाता है तो दुख के क्षण आते ही हैं। पिता-पुत्री और पति-पत्नी का रिश्ता कितना मजबूत होता है, यह हम जानते हैं। ऐसे में उनके सिर से साए का उठ जाना अत्यंत पीड़ादायक होता है। लेकिन यह भी सत्य है कि आज हमारी बारी है, कल किसी और की होगी। हम सभी को एक दिन जाना है, क्योंकि हमारी डोर किसी और के हाथ में है। डॉ. अलका वशिष्ठ अत्यंत साहसी महिला हैं। विभाग के प्रति उनका लगाव, विद्यार्थियों के प्रति उनकी संवेदनाएं, उनकी मेहनत और समर्पण देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उनके पति भी ऐसे ही उच्च चरित्र के व्यक्ति रहे होंगे। मैं श्री दिनेश कुमार वशिष्ठ को अपनी गहरी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

उर्दू विभाग के शिक्षक डॉ. आसिफ अली ने कहा कि यह कहना तो बहुत आसान है कि जो आया है उसे जाना ही है, लेकिन असली स्थिति वही समझ सकता है जिसके घर से कोई अपना चला जाता है। मेरी दिनेश कुमार वशिष्ठ जी से अनेक बार मुलाकात हुई। वे अत्यंत सरल स्वभाव, स्पष्ट वक्ता और साफ दिल के इंसान थे। जो बात उनके मन में होती थी, उसे तुरंत व्यक्त कर देते थे। वे बेहद सच्चे और सभ्य व्यक्ति थे। लंबे समय से बीमार रहने के बावजूद वे हमेशा शांत और संतुलित दिखाई देते थे। इस युग में सुकून उसी व्यक्ति को मिल सकता है जिसने मानवता की सेवा की हो। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वे उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें तथा उनकी पत्नी और बेटी को धैर्य दें। इस दुख की घड़ी में हम सब उनके साथ हैं।

डॉ. अलका वशिष्ठ ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हमने इस विभाग में अनेक लोगों की श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की हैं, लेकिन यह कभी नहीं सोचा था कि एक दिन मुझे अपने ही पति की श्रद्धांजलि सभा में शामिल होना पड़ेगा। मेरे लिए इससे बड़ा दुख कोई नहीं हो सकता। जिस व्यक्ति ने जीवन के हर कदम पर मेरा साथ दिया, मुझे साहस और हौसला दिया, हमेशा चट्टान की तरह मेरे साथ खड़ा रहा, आज वह हमारे बीच नहीं है। विवाह के बाद उन्होंने मुझसे मेरी इच्छा पूछी। जब मैंने आगे पढ़ने की बात कही तो उन्होंने मेरा पीएच.डी. में प्रवेश कराया। उन्होंने ही मुझे आगे बढ़ाया और समाज की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति दी। जीवन के हर मोड़ और हर कठिनाई में वे मेरे साथ रहे। जब वे बीमार थे, तब भी हमें यह संतोष था कि वे हमारे बीच हैं। लेकिन आज ऐसा लगता है कि सब कुछ समाप्त हो गया है। वे हमेशा कहा करते थे कि कोई भी समस्या हो, मुझे बताना, मैं संभाल लूंगा। उनकी कमी हमेशा महसूस होगी। उन्होंने ही मुझे शक्ति प्रदान की जो मैं उनकी देहदान की इच्छा को पूरा कर पाई।

इस अवसर पर बी.बी. शर्मा, सागर शर्मा, जितेंद्र सी. राज, हेमंत गोयल, मोहम्मद आबिद सैफी, अतहर खान, मोहम्मद शमशाद तथा सईद अहमद सहारनपुरी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

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