नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। राज्य ललित कला अकादमी, उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग व चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के ललित कला संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “बीस दिवसीय ग्रीष्मकालीन कला कार्यशाला 2026-27” के अंतर्गत आज 45 प्रतिभागियों को वारली लोक कला का प्रशिक्षण प्रदान किया गया। कार्यशाला में प्रतिभागियों ने पारंपरिक वारली शैली में ग्रामीण जीवन, प्रकृति, लोक संस्कृति एवं सामाजिक गतिविधियों को रेखाओं और ज्यामितीय आकृतियों के माध्यम से अत्यंत सुंदर ढंग से चित्रित किया।
कार्यशाला की समन्वयक प्रोफेसर अलका तिवारी ने बताया कि माननीय कुलपति महोदया प्रोफेसर संगीता शुक्ला के मार्गदर्शन एवं प्रेरणा से यह कार्यशाला निरंतर सफलतापूर्वक संचालित की जा रही है। उन्होंने कहा कि ऐसी कार्यशालाएं विद्यार्थियों एवं युवा कलाकारों को भारतीय लोक कलाओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। कार्यशाला के अंतर्गत प्रशिक्षक डॉ॰ रीता सिंह ने प्रतिभागियों को वारली कला की उत्पत्ति, पारंपरिक स्वरूप, प्रतीकों तथा रेखांकन की तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वारली कला महाराष्ट्र की प्रसिद्ध जनजातीय लोक कला है, जिसमें दैनिक जीवन, खेती, नृत्य, पशु-पक्षी एवं प्रकृति को सरल ज्यामितीय आकृतियों द्वारा दर्शाया जाता है। इस कला की विशेषता इसकी सादगी, लयात्मकता एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है।
प्रोफेसर अलका तिवारी ने कहा कि भारतीय लोक कलाएं हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं तथा आज के समय में ये आत्मनिर्भरता एवं स्वरोजगार के प्रभावी साधन के रूप में भी उभर रही हैं। हस्तनिर्मित कलाकृतियों, वस्त्र सज्जा, गृह सज्जा सामग्री तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से युवा कलाकार रोजगार के नए अवसर प्राप्त कर सकते हैं।कार्यशाला में प्रतिभागियों ने अत्यंत उत्साह एवं सक्रियता के साथ सहभागिता की तथा अपनी कलात्मक प्रतिभा का प्रभावशाली प्रदर्शन किया। इस अवसर पर डॉ॰ शालिनी धामा, डॉ॰ रीता सिंह, दीपांजली, कृतिका, खालिद सहित सभी शिक्षकों एवं सहयोगियों का विशेष योगदान रहा। कार्यक्रम का वातावरण भारतीय लोक संस्कृति, कला एवं सृजनात्मक ऊर्जा से ओत-प्रोत रहा।

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