सपना सी.पी. साहू
नित्य संदेश, नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 देशों (यूएई, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली) की यात्रा पर गए हुए हैं। उन्हें भारतीय इतिहास और संस्कृति को सहेजने के प्रयासों में देश को एक और बड़ी वैश्विक सफलता मिली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नीदरलैंड से 11वीं शताब्दी के चोल काल के बहुमूल्य और ऐतिहासिक तांबे के पत्र (ताम्रपत्र) वापस लेकर भारत लौटेंगे। नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटन की उपस्थिति में आयोजित एक भव्य और ऐतिहासिक समारोह के दौरान इन ताम्रपत्रों को आधिकारिक रूप से भारत को सौंपा गया।
यह चोल ताम्रपत्र भारतीय ऐतिहासिक धरोहर है, जो चोल राजवंश की महानता, उनकी प्रशासनिक व्यवस्था और समुद्री शक्ति की गवाह है। जो विशाल संग्रह नीदरलैंड से वापस लाया गया है, इनमें तांबे की प्लेटों (लीडेन प्लेट्स) का कुल वजन लगभग 30 किलोग्राम है। इस संग्रह में कुल 24 प्लेटें (21 बड़ी और 3 छोटी) शामिल हैं, जो एक कांस्य की अंगूठी से आपस में जुड़ी हुई हैं।
इन प्लेटों पर दुनिया की सबसे प्राचीन और खूबसूरत भाषाओं में से एक, 'तमिल' में लेख खुदे हुए हैं। इन ताम्रपत्रों पर महान राजा राजेंद्र चोल प्रथम द्वारा अपने पिता राजा राजराजा प्रथम के एक मौखिक वादे को औपचारिक और कानूनी रूप देने से संबंधित हैं।
यह चोल ताम्रपत्र 19वीं शताब्दी के मध्य से नीदरलैंड की प्रसिद्ध लीडन यूनिवर्सिटी (Leiden University) में बेहद सुरक्षित तरीके से रखे गए थे। प्रधानमंत्री ने इस अमूल्य धरोहर को सदियों तक सुरक्षित रखने और इसे पूरे सम्मान के साथ भारत को सौंपने के लिए नीदरलैंड सरकार और विशेष रूप से लीडन यूनिवर्सिटी का सहृदय धन्यवाद व्यक्त किया है।
प्रधानमंत्री ने कहा — "यह हर भारतीय के लिए बेहद खुशी और गर्व का क्षण है। हम भारतीयों को चोल राजवंश, उनकी अद्वितीय संस्कृति और उनकी अदम्य समुद्री शक्ति पर अत्यधिक गर्व है।"
यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की एक और बड़ी जीत है। विदेशी धरती पर सदियों से मौजूद भारतीय संस्कृति के प्रतीकों और धरोहरों को वापस लाने की कड़ी में इसे एक बहुत बड़ी कूटनीतिक और सांस्कृतिक कामयाबी के रूप में भी देखा जा रहा है। इन ताम्रपत्रों के भारत आने से चोल साम्राज्य के इतिहास पर शोध कर रहे इतिहासकारों और शोधकर्ताओं को भी नई दिशा मिलेगी।




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