प्रेम की इमारत
बहुत ख्वाहिश थी उस 'प्रेम की इमारत' को देखें।
जिनके मर जाने पर भी पूरा महल बना
उस हुस्न की मलिका के परवाज़ करने
पर बने आशियानें को देखें।
नख से सिर तक सिंगार किया
एक मल्लिका से मिलने के लिए मल्लिका जो लगना था
पहनने जब झुमका लगे
मेरे गोल झुमके से काश ताज दिखे
इस अरमान ने मुझे हंसा दिया
बिना बात के ही दिल बहला दिया
काश ये हमारा वतन ऐसा ही रहे
हर मुमताज की जिंदगी में उसका ताजमहल बनें
दिखे झुमके से आशियाना उसे अपना
घर में इतना मान सम्मान मिले।
डॉ शबनम सुल्ताना
फिजियोथैरेपिस्ट और साहित्यकार


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