खुशफहमी
बेकरार होकर भी एक करार सा दिल में था।
नादान था जिसे उसका इंतज़ार आज भी था।
ख्वाबों में कभी रुखसार पे पर्दा न था।
रूबरू होकर हमें वो पहचानता न था।
आब-ए-दीद ने अरुण उन्हें मोती बनाया था।
उसके अश्क से महंगा वहां कोई और न था।
थी ये खुशफहमी कि बस हम थे उनकी नज़रों का मरकज़।
आज यकीन आया हमसा कोई खुशफहम इस ज़माने में न था।
— अरुण कैलाशनाथ चतुर्वेदी
लेखक व व्यवसायी


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