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Friday, March 13, 2026

निष्क्रिय इच्छामृत्यु बनाम उपचार और सुधार की संभावना: एक चिकित्सीय और नैतिक चिंतन


नित्य संदेश। हाल ही में हरीश राणा, जो गाजियाबाद के निवासी हैं, से संबंधित समाचारों ने एक बार फिर लंबे समय से गंभीर न्यूरोलॉजिकल विकलांगता से पीड़ित रोगियों में निष्क्रिय इच्छामृत्यु के जटिल और संवेदनशील विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा को जन्म दिया है। अपने सिविल इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम के दौरान चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में हुई गंभीर दुर्घटना के बाद वे लगभग तेरह वर्षों से गहरे कोमा और क्वाड्रिप्लेजिया की अवस्था में हैं। उनकी दीर्घकालिक चिकित्सीय स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उनके मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति प्रदान की है।

जहाँ न्यायपालिका ऐसे मामलों का मूल्यांकन गरिमा, स्वायत्तता और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर करती है, वहीं चिकित्सा जगत इन्हें एक अलग दृष्टिकोण से देखता है—वह है निरंतर विकसित होती चिकित्सा विज्ञान, नई उपचार पद्धतियों और न्यूरोलॉजिकल सुधार की अनिश्चित किंतु संभावित संभावना का दृष्टिकोण। हरिश राणा जैसे मामले यह दर्शाते हैं कि गंभीर मस्तिष्क चोट वाले रोगियों में जीवन के अंतिम निर्णय कितने गहरे नैतिक और चिकित्सीय द्वंद्व उत्पन्न करते हैं।

दीर्घकालिक कोमा की चिकित्सीय चुनौतियाँ

लंबे समय तक कोमा या पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट से पीड़ित रोगी आधुनिक चिकित्सा के लिए सबसे कठिन चुनौतियों में से एक हैं। गंभीर ट्रॉमैटिक ब्रेन इंजरी मस्तिष्क को व्यापक क्षति पहुँचा सकती है, जिसके कारण चेतना का लोप, शरीर का पक्षाघात तथा संचार करने की क्षमता समाप्त हो जाती है। हरिश राणा के मामले में क्वाड्रिप्लेजिया की अतिरिक्त जटिलता शारीरिक सुधार की संभावनाओं को और सीमित कर देती है।

फिर भी, न्यूरोसाइंस तेजी से विकसित हो रहा क्षेत्र है। पिछले एक दशक में कई नई उपचार विधियाँ सामने आई हैं, जिनमें उन्नत न्यूरो-रिहैबिलिटेशन, स्टेम सेल आधारित प्रायोगिक उपचार, न्यूरल स्टिमुलेशन तकनीकें तथा अत्याधुनिक गहन चिकित्सा समर्थन प्रणाली शामिल हैं। यद्यपि इनमें से कई उपचार अभी अनुसंधान और नैदानिक परीक्षण के चरण में हैं, फिर भी कुछ मामलों में आंशिक सुधार या कार्यात्मक प्रगति की संभावनाएँ बनी रहती हैं।

चिकित्सीय साहित्य में ऐसे दुर्लभ किन्तु महत्वपूर्ण उदाहरण भी दर्ज हैं, जिनमें कई वर्षों की न्यूरोलॉजिकल विकलांगता के बाद भी रोगियों में कुछ सुधार देखा गया है। यह तथ्य इस बात को पुष्ट करता है कि उचित चिकित्सा और पुनर्वास के साथ मानव मस्तिष्क में अनुकूलन और पुनर्निर्माण की अद्भुत क्षमता होती है।

निष्क्रिय इच्छामृत्यु के नैतिक आयाम

निष्क्रिय इच्छामृत्यु, जिसका अर्थ जीवन रक्षक उपचार को रोकना या वापस लेना है, भारत में कुछ निर्धारित दिशानिर्देशों के अंतर्गत वैधानिक रूप से स्वीकार्य है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय, जैसे Common Cause v. Union of India, ने इस विषय पर स्पष्ट दिशानिर्देश स्थापित किए हैं। इन निर्णयों में रोगी की स्वायत्तता, लिविंग विल और गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार पर बल दिया गया है।

फिर भी चिकित्सा और सामाजिक क्षेत्रों में इस विषय पर नैतिक बहस जारी है। निष्क्रिय इच्छामृत्यु के आलोचकों का मानना है कि जीवन समाप्त करने से जुड़े निर्णय अत्यंत सावधानी और संवेदनशीलता से लिए जाने चाहिए, विशेषकर तब जब चिकित्सा विज्ञान निरंतर नई संभावनाओं के द्वार खोल रहा हो। जब मामला ऐसे युवा व्यक्तियों का हो जो किसी अपक्षयी रोग के बजाय दुर्घटना के कारण इस स्थिति में पहुँचे हों, तब यह नैतिक दुविधा और भी गहरी हो जाती है।

परिवारों पर सामाजिक और आर्थिक बोझ

लंबे समय तक गंभीर बीमारी की स्थिति में परिवारों पर अत्यधिक आर्थिक और भावनात्मक दबाव पड़ता है। दीर्घकालिक गहन चिकित्सा, पुनर्वास, नर्सिंग देखभाल और सहायक उपचार वर्षों तक भारी संसाधनों की मांग करते हैं। जिन देशों में दीर्घकालिक चिकित्सा सहायता की समुचित व्यवस्था नहीं है, वहाँ परिवार अक्सर उपचार जारी रखने में कठिनाई का सामना करते हैं।

ऐसी परिस्थितियों में कभी-कभी जीवन रक्षक उपचार को बंद करने का निर्णय चिकित्सा कारणों से अधिक आर्थिक विवशता से प्रभावित हो सकता है। यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है—क्या समाज और सरकार को गंभीर न्यूरोलॉजिकल विकलांगता से पीड़ित रोगियों की सहायता के लिए अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए?

सरकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति की भूमिका

हरिश राणा जैसे मामले यह संकेत देते हैं कि गंभीर मस्तिष्क चोट वाले रोगियों के लिए संगठित सरकारी सहायता व्यवस्था की आवश्यकता है। दीर्घकालिक न्यूरो-रिहैबिलिटेशन कार्यक्रमों की स्थापना, प्रभावित परिवारों को वित्तीय सहायता और उन्नत न्यूरोलॉजिकल उपचारों पर अनुसंधान को प्रोत्साहन देने से बेहतर परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।

यदि सरकार ऐसे जटिल मामलों में उपचार और पुनर्वास की आर्थिक जिम्मेदारी वहन करे, तो इससे नियंत्रित और वैज्ञानिक रूप से पर्यवेक्षित क्लीनिकल ट्रायल तथा प्रायोगिक उपचारों के लिए भी अवसर मिल सकता है। इससे न केवल रोगी को सुधार का अवसर मिल सकता है, बल्कि भविष्य में ऐसे हजारों रोगियों के लिए उपयोगी वैज्ञानिक जानकारी भी प्राप्त हो सकती है।

अनुसंधान और नवाचार के माध्यम से आशा

चिकित्सा विज्ञान ने बार-बार यह सिद्ध किया है कि बड़े वैज्ञानिक परिवर्तन निरंतर अनुसंधान और प्रयोगों से ही संभव होते हैं। जो न्यूरोलॉजिकल विकार पहले असाध्य माने जाते थे, वे आज पुनर्योजी चिकित्सा, न्यूरोप्रोस्थेटिक्स और ब्रेन–कंप्यूटर इंटरफेस जैसी तकनीकों के कारण धीरे-धीरे प्रबंधनीय बनते जा रहे हैं।

इस प्रकार लंबे समय से बीमार रोगियों को संगठित अनुसंधान ढांचे में शामिल करना दोहरा लाभ दे सकता है—एक ओर रोगी के प्रति मानवीय संवेदनशीलता का निर्वहन और दूसरी ओर समाज के लिए वैज्ञानिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करना।

करुणा और संभावना का दृष्टिकोण

मानवीय और चिकित्सीय दृष्टिकोण से प्रत्येक जीवन अपने भीतर सुधार, सीख और वैज्ञानिक प्रगति की संभावना समेटे होता है। यद्यपि निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कुछ परिस्थितियों में कानूनी मान्यता प्राप्त है, फिर भी भविष्य में संभावित चिकित्सा प्रगति की संभावना यह संकेत देती है कि विशेष रूप से दुर्घटना के कारण गंभीर स्थिति में पहुँचे युवा रोगियों के उपचार और देखभाल को जल्दबाजी में समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।

ऐसे असाधारण मामलों में सरकार द्वारा समर्थित उपचार व्यवस्था व्यक्तिगत त्रासदी को चिकित्सा प्रगति और समाज के लिए आशा में परिवर्तित कर सकती है।

 निष्कर्ष

हरिश राणा का मामला केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु से संबंधित कानूनी निर्णय नहीं है। यह चिकित्सा अनिश्चितता, नैतिक जिम्मेदारी, सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं और तेजी से विकसित हो रहे न्यूरोसाइंस के बीच के जटिल संबंधों को दर्शाता है।

ऐसे मामलों को केवल जीवन के अंत के निर्णय के रूप में देखने के बजाय उपचार को बनाए रखने, अनुसंधान को प्रोत्साहित करने और प्रभावित परिवारों को सहयोग देने के व्यापक दृष्टिकोण से भी देखना आवश्यक है। संस्थागत समर्थन और वैज्ञानिक प्रतिबद्धता के साथ आज की सबसे कठिन चिकित्सा स्थितियाँ भी भविष्य में महत्वपूर्ण प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं।


प्रोफेसर (डॉ.) अनिल नौसरान
संस्थापक – साइक्लोमेड फिट इंडिया
चिकित्सक एवं सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता

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