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Saturday, January 10, 2026

एक गांव हिल गया, एक मां मिट गई, मगर चेहरों पर न दर्द उतरा, न शर्म, न पछतावे की परछाईं


शाहीन मिर्ज़ा 
नित्य संदेश, सरधना। गांव से लापता हुए पारस और रूबी ने महज दो दिनों में पूरे *गांव की धड़कनों* को बेचैन कर दिया। यह सिर्फ दो लोगों के गायब होने की घटना नहीं थी, बल्कि एक ऐसा भूचाल था जिसने गांव की शांति, आपसी भरोसे और इंसानियत की नींव तक हिला दी।

इन दो दिनों में कपसाड़ महज एक गांव नहीं रहा, वह अफवाहों, आशंकाओं और सियासत का अड्डा बन गया। हर गली में सवाल गूंजते रहे, हर चौपाल पर बहसें होती रहीं। पुलिस और प्रशासन की टीमें दिन-रात एक कर तलाश में जुटी रहीं। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक, हर जगह इसी मामले की चर्चा होती रही और देशभर की नजरें इस छोटे से गांव पर टिक गईं।

आज जब मेरठ पुलिस दोनों को सहारनपुर से सकुशल बरामद कर लाई, तो उम्मीद थी कि राहत की सांस ली जाएगी, लेकिन माहौल में सुकून नहीं, बल्कि एक अजीब-सी सन्नाटा छा गया। लोगों की आंखों में खुशी नहीं, बल्कि हैरानी और आक्रोश था। तस्वीर मे दिखे पारस और रूबी के चेहरों पर न डर था, न घबराहट, न ही किसी तरह का पछतावा—मानो यह सब कुछ उनके लिए कोई मायने ही न रखता हो।

इस पूरे घटनाक्रम की सबसे कड़वी और दर्दनाक सच्चाई यह है कि एक बेटी को बचाने की कोशिश में एक निर्दोष मां को अपनी जान गंवानी पड़ी। वह मां अब कभी अपनी बेटी को आवाज नहीं दे पाएगी, लेकिन उसके जाने से समाज के सामने ऐसे सवाल खड़े हो गए हैं, जिनके जवाब आसान नहीं हैं।

आज समाज खुद से पूछ रहा है
क्या हम इतने असंवेदनशील हो चुके हैं कि एक मां की मौत भी हमारे चेहरों पर दर्द नहीं ला पाती?
 क्या इंसानी रिश्तों की कीमत इतनी गिर चुकी है कि जिंदगी और मौत के बीच का फर्क ही मिटता जा रहा है?

कपसाड़ की यह घटना महज एक अपराध की कहानी नहीं, बल्कि आज के समय का कड़वा सच है। एक ऐसा सच, जिसमें सिस्टम की मजबूरी भी दिखती है और समाज की खामोशी भी। 

अब जरूरत सिर्फ लोगों की बरामदगी भर की नहीं, बल्कि सच को सामने लाने, जिम्मेदारी तय करने और इंसाफ दिलाने की है— ताकि किसी और मां की जिंदगी बेटी के नाम पर यूं ही खत्म न हो।

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