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पुष्पक पर आसीन,
युगल ज्यों जल मीन,
सियाराम छवि लगे,
ललित ललाम है।
पधारी जोड़ी अयोध्या,
स्वप्न साकेत संजोया,
अब प्रतीक्षा समाप्त,
सुखी निज धाम है।
जगमग हुई पुरी,
दर्श, इच्छा न अधूरी,
दीपावली बन रही,
तमस विराम है।
घी के दीपक जलाएं,
आंगने चौक पुराएं,
भोग, लड्डू, पेडे़ बंटे,
गूंजे सीता राम है।
सपना सी.पी. साहू 'स्वप्निल'
इंदौर (म.प्र.)
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