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Tuesday, October 29, 2024

उर्दू के प्रचार-प्रसार में मदरसों की भूमिका को कभी नहीं भुलाया जा सकता: डॉ. आसिफ अली

सीसीएसयू के उर्दू विभाग में 'भारतीय मदरसों में उर्दू की स्थिति' विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम का आयोजन किया गया

नित्य संदेश ब्यूरो 
मेरठ। प्रत्येक भाषा और संस्कृति अपने बोलने वालों और मानने वालों के लिए सबसे मधुर, महान और प्रेरणादायक होती है क्योंकि भाषा भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम है और भावनाएं दिल और समझ के जितनी करीब होंगी, उतनी ही प्रभावी होंगी। हालाँकि, उच्चारण की दृष्टि से उर्दू को यह सम्मान भी प्राप्त है कि उसकी वर्णमाला में कुछ ऐसे अक्षर हैं जिनकी ध्वनियाँ उर्दू को अन्य भाषाओं से अलग बनाती हैं। ये शब्द थे डॉ आसिफ अली के, जो उर्दू विभाग और इंटरनेशनल यंग उर्दू स्कॉलर्स एसोसिएशन (आईयूएसए) द्वारा "भारत में मदरसों में उर्दू की स्थिति" विषय पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। उन्होंने आगे कहा कि उर्दू के प्रचार-प्रसार में मदरसों की भूमिका को कभी नहीं भुलाया जा सकता। भाषा को बढ़ावा देने के सभी माध्यमों में मदरसों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उदाहरण के लिए, पढ़ने, लिखने और बोलने के मामले में उर्दू हमेशा शीर्ष पर रही है।
  
इससे पहले कार्यक्रम की शुरुआत सईद अहमद सहारनपुरी ने पवित्र कुरान की तिलावत से की, नात नुजहत अख्तर ने प्रस्तुत की। प्रसिद्ध धार्मिक विद्वान मौलाना शाह आलम गोरखपुरी ने मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया और मौलाना मुहम्मद जिब्रील ने विशिष्ट अतिथि के रूप में भाग लिया, संचालन रिसर्च स्कॉलर सैयदा मरियम इलाही ने किया। विषय प्रवेश कराते हुए डॉ. इरशाद स्यानवी ने कहा कि भारत के मदरसों ने शुरू से ही उर्दू की निःस्वार्थ सेवा की है। कई मदरसों में आप देखेंगे कि न्यायशास्त्र, न्यायशास्त्र के सिद्धांत, हदीस, उसूल हदीस, तफ़सीर, तर्क, दर्शन, अनुवाद आदि उर्दू भाषा के माध्यम से ही पढ़ाए जाते हैं और आज अधिकांश मदरसों के पास अपने स्वयं के उर्दू समाचार पत्र, पत्रिकाएँ हैं और अन्य उर्दू पुस्तकें भी लगातार प्रकाशित हो रही हैं।
  
प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने कहा कि मदरसों में उर्दू पढ़ाने वाले शिक्षकों में से कई ऐसे शिक्षक हैं जिनके पास अपार क्षमताएं हैं और उन्होंने उर्दू को बेहतर रूप से संवारा हैं. यदि मदरसे न हों तो उर्दू का समृद्धि कम हो जायेगी, इसमें कोई संदेह नहीं कि मदरसों ने उर्दू की बहुत बड़ी सेवा की है और आज भी वे इस कर्तव्य को भली-भांति निभा रहे हैं।
  
मौलाना जिबरील ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उर्दू भाषा में एक-दूसरे से मिलने और प्यार फैलाने की क्षमता है। भारत की आज़ादी के बाद बहुत से लोगों को लगा कि उर्दू हमारी भाषा नहीं है, जबकि मदरसों ने उर्दू की उत्कृष्ट सेवाएँ की हैं। आज भारत में उर्दू बोलने वालों की बड़ी संख्या है। उर्दू शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। जब तक मदरसे रहेंगे, उर्दू भी उसी शान से रहेगी। मदरसों के अलावा और भी संस्थाएं हैं जो उर्दू के प्रचार-प्रसार के लिए काम कर रही हैं और एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उर्दू में धर्म इस्लाम का एक बड़ा संग्रह मौजूद है।
  
मौलाना शाह आलम गोरखपुरी ने कहा कि इस्लाम को समझने और उस पर जीने के लिए उर्दू भाषा का खजाना है। जो भाषा किसी राष्ट्र की होगी उसका भविष्य भी स्वर्णिम होगा। हालाँकि भाषा किसी राष्ट्र की नहीं होती. भाषाएँ और संस्कृतियाँ किसी की बपौती नहीं हैं, उन पर सबका समान अधिकार है लेकिन उर्दू भाषा में मिठास और मधुरता है। मैंने दुनिया के अधिकांश देशों की यात्रा की और देखा कि मैं अपने देश में उर्दू भाषा का उपयोग करके लौटता हूं। अल्लाह ने सभी देशों के बीच उर्दू भाषा को पूर्णता प्रदान की है जो हर मामले में लोकप्रिय है। मदरसा शिक्षकों के पास उर्दू के अलावा कुछ भी नहीं है, जो राष्ट्र उर्दू के माध्यम से अपने धर्म को समझेगा उसका अतीत, वर्तमान और भविष्य उज्ज्वल होगा। मदरसों में उर्दू के कट्टरपंथी मिलते हैं, मदरसों में उर्दू फैलती है, उर्दू इस्लामिया मदरसों की भाषा है।

कार्यक्रम से फरहत अख्तर, मुहम्मद शमशाद, नुजहत अख्तर एवं छात्र-छात्राएं जुड़े हुए थे.

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