देवी-देवताओं में गणपति बप्पा को प्राप्त है उच्च स्थान
सपना साहू
नित्य संदेश, डेस्क। गणेश चतुर्थी जिसे विनायक चतुर्थी, विनायक चौथ और कुछ लोग कलंक चतुर्थी के नाम से भी जानते है। यह सनातनियों के प्रथम पूज्यनीय देवता श्री गणेश के प्राकट्योत्सव का त्योहार है। यह त्योहार श्री गणेश की मिट्टी की मूर्तियों को निजी तौर पर घरों, कार्यस्थलों और सार्वजनिक रूप से विस्तृत पंडालों में स्थापित करने या चिह्नित करने का महापर्व है। अनुष्ठानों में, वैदिक भजनों, हिंदू ग्रंथों में अंकित प्रार्थना, व्रत तथा जाप करना सम्मिलित है। श्री गणेश की मिट्टी की मूर्ति को संगीत और समूह मंत्रोच्चार के साथ सार्वजनिक जुलूस में हर्षोल्लास के साथ स्थापित किया जाता है। यूं तो यह उत्सव चतुर्थी से शुरू होने के दसवें दिन चतुर्दशी पर समाप्त होता है। फिर भी भक्त कहीं एक, तो कहीं तीन, पांच, सात और कही-कही पूरे दस दिन की गणेश जी की सेवा करते है। पर अधिकतर तो अनंत चतुर्दशी के दिन तालाब, नदियों, समंदर या अन्य जल निकायों में गणपति जी को सुख समृद्धि देकर जाने और अगले वर्ष फिर आने के भाव से विसर्जन करते है। तत्पश्चात मिट्टी की मूर्ति जल में विलीन हो जाती है और माना जाता है कि गणेश अपने दिव्य निवास पर लौट चुके हैं। अकेले मुंबई में लगभग 1,50,000 मूर्तियां सालाना विसर्जित की जाती हैं। पूरे देश का आंकडा करोड़ों में है।
विनायक पूजन महोत्सव और मुस्लिम राष्ट्र के नोट पर अंकित गणेश जी
यह उत्सव विघ्न हरने की प्रार्थना के साथ ज्ञान और बुद्धि के देवता विनायक के पूजन के लिए मनाया जाता है। श्री गणेश उत्सव हिंदूओं द्वारा भारतीय उपमहाद्वीप में विशेष रूप से महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और गोवा जैसे राज्यों के साथ-साथ नेपाल में भी मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी पर्व अन्यत्र विदेशों में हिंदू प्रवासियों के द्वारा भी मनाया जाता है। जिसमें ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया, त्रिनिदाद, टोबैगो, गुयाना, सूरीनाम, कैरिबियन के अन्य भागों सहित फिजी, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप प्रमुख उल्लेखनीय है। प्रथम पूज्य बप्पा तो इतने सम्माननीय है कि मुस्लिम देश इंडोनेशिया के नोटो पर रिद्धि-सिद्धि के दाता गणेश जी का चित्र अंकित है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार गणेश चतुर्थी प्रत्येक वर्ष 22 अगस्त से 20 सितंबर के बीच आती है।
स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक ने की थी गणेशोत्सव की शुरुआत
हालांकि गणेश चतुर्थी पूर्व में घरों के अंदर ही गोबर मिट्टी के गणेश स्थापित कर व्रत रखकर की जाती थी। लेकिन जब देश अंग्रेजों का गुलाम था तब वर्ष 1893 में महाराष्ट्र में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाल गंगाधर तिलक द्वारा सार्वजनिक रूप से लोगों को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए इस उत्सव की शुरुआत की। बाद में यह तेजी से भारतवर्ष में लोकप्रिय हो गया। यह हिंदू राष्ट्रवादी पहचान बनाने और ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह करने का एक साधन बना था। अब तो इसकी लोकप्रियता संसार में है। भारत में इसके दस दिवसीय आयोजन में सार्वजनिक स्थलों पर ग्रंथों का वाचन, भोज, एथलेटिक और मार्शल आर्ट, विभिन्न कलात्मकता आदि जैसी प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं।
हर पूजा में सबसे पहले होती है गणेश जी की उपासना
सभी देवी-देवताओं में गणपति बप्पा को उच्च स्थान प्राप्त है। इसी वजह से किसी भी भगवान की पूजा से पहले गणेश जी की उपासना की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यदि साधक नियमित रूप से भगवान गणेश जी की आराधना करता है, तो उसके घर-परिवार में सदा सकारात्मकता बनी रहती है। इसके अलावा धन की देवी माता लक्ष्मी की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है। भगवान गणेश की उपासना करने के लिए गणेश चतुर्थी के त्योहार को शुभ माना जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन लोग अपने घर में गणपति बप्पा की मूर्ति लेकर आते हैं। 10 दिन तक उनकी पूजा करते हैं और आखिरी दिन मूर्ति का विसर्जन करके बप्पा को विदा करते हैं।
10 दिनों तक क्यों मनाते हैं पर्व?
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान गणेश से वेदव्यास जी ने महाभारत ग्रंथ लिखने का आग्रह किया था। वेदव्यास जी के कहने पर भगवान गणेश ने बिना रुके 10 दिन तक महाभारत ग्रंथ लिखा था। 10 दिन तक गणेश जी ने न तो कुछ खाया था और न ही अपनी जगह से हिले थे। ऐसे में इस दौरान भगवान गणेश के शरीर पर धूल-मिट्टी जमा हो गई थी। उनके कपड़े गंदे हो गए थे। 10 वें दिन अनंत चतुर्दशी तिथि पर भगवान गणेश जी ने महाभारत को लिखकर पूरा किया।
पृथ्वी पर भ्रमण करने आते हैं गणेश जी
पूरी महाभारत लिखने के बाद भगवान गणेश जी ने 10 वें दिन सरस्वती नदी में स्नान किया था। इसी के बाद से गणेशोत्सव 10 दिनों तक मनाया जाता है और 10 वें दिन अनंत चतुर्दशी के मौके पर भगवान गणेश जी की मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। माना जाता है कि इन 10 दिनों के दौरान भगवान गणेश हर साल पृथ्वी पर भ्रमण करने के लिए आते हैं। इसी वजह से इस समय अपने घर में भगवान गणेश की मूर्ति को लाना और उसकी विधिपूर्वक पूजा करना शुभ माना जाता है।
कलंक चतुर्थी कहे जाने का कारण
वर्ष में बारह मासी चतुर्थी आती है जिसमें 11 चतुर्थी पर व्रत पूजन, चंद्र दर्शन पश्चात भोजन ग्रहण करने का विधान है। पर भादौमास में गणेश जन्मोत्सव की चौथ पर चांद नहीं देखा जाता क्योंकि जब गणेश जी को माता पार्वती ने अपने शरीर पर मले हल्दी के उबटन से बालक रूप बनाया और जीवन दिया तो पुत्र को स्नान पर जाने से पूर्व आदेश दिया कि किसी को भी गृहप्रवेश न करने दें लेकिन इस बीच शिव जी आ गए और उबटन से बने पुत्र गणेश को ना शिव जी पहचान पाए और ना ही बालक गणेश अपने पिता शिव जी को जान सके। तब गणेश जी ने पिता शिव जी तक को प्रवेश करने से रोक दिया, शिव जी के समझाने पर भी नहीं माने बल्कि उनसे बलपूर्वक बहस करने लगे तब शिव जी ने क्रोध में गणेश जी का सर त्रिशूल से काट दिया।
अब पार्वती जी बाहर आई तो पुत्र वियोग में बहुत विलाप करने लगी तब शिव जी ने अपने गणों को आदेश दिया कि उत्तर दिशा में जो भी मां की पीठ अपने पुत्र की ओर हो उस प्राणी का शीश ले आओ। तब गण उत्तर दिशा में गए तो हथिनी और हथिनी का शिशु इस अवस्था में मिला और उसे गण ले आए और तब शिव जी ने गणेश जी को गज मस्तक से शोभायमान किया।
लेकिन जब चंद्रमा ने गणेश जी का गजमुख देखा तो उपहास किया जिससे गणेश जी बहुत क्रोधित हुए और चंद्र को श्राप दिया कि चंद्रमा आपको सुंदरता पर अभिमान है लेकिन जो इस दिन आपके दर्शन करेंगा वह कलंकित होगा। इस किवदंती के चलते ही आज भी भादौमास की गणेश जन्मोत्सव की चतुर्थी पर सनातनी चांद नहीं देखते और इसे कलंक चतुर्थी भी कहते है।
17 सितंबर को मनाया जाएगा अनंत चतुर्दशी का त्योहार
भाद्रपद माह की चतुर्थी तिथि के दिन हर साल गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है, जिसका समापन अनंत चतुर्दशी के दिन होता है। वैदिक पंचांग के अनुसार, इस बार गणेश चतुर्थी का त्योहार 7 सितंबर 2024 को मनाया जाएगा। वहीं मूर्ति का विसर्जन यानी अनंत चतुर्दशी का त्योहार 17 सितंबर 2024 को मनाया जाएगा।

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