चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में ‘मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी सौदा की क़सीदा-निगारी’ विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित।
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। “उर्दू साहित्य ने सौदा के साथ न्याय नहीं किया। अमीर ख़ुसरो की पहेलियाँ तो पढ़ी जाती हैं, लेकिन सौदा के बहुत से क़सीदों से हमारे पाठक आज भी अनजान हैं। सौदा के काव्य पर सबसे अधिक प्रभाव बेदिल का है। सौदा ने बेदिल से काफी लाभ प्राप्त किया। क़सीदे में व्यंग्य को स्थान देना हमें सौदा ने सिखाया।” ये विचार अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शोधकर्ता एवं आलोचक डॉ. तक़ी आबिदी ने आयोसा तथा उर्दू विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी सौदा की क़सीदा-निगारी’ विषयक ऑनलाइन कार्यक्रम में व्यक्त किए।
उन्होंने आगे कहा कि सौदा के क़सीदों में नवीनता, ताज़गी और आधुनिकता दिखाई देती है। क़सीदे की भाषा कुछ कठिन है, लेकिन इस विषय पर कार्य किए जाने की आवश्यकता है। सौदा ने क़सीदा, मर्सिया, मनक़बत, रुबाई आदि विधाओं में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ सईद अहमद सहारनपुरी ने किया। कार्यक्रम की संरक्षकता प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. असलम जमशेदपुरी तथा अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शोधकर्ता एवं आलोचक डॉ. तक़ी आबिदी (कनाडा) ने की। अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. सगीर अफ़राहीम ने की। मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. नसीम अहमद, पूर्व अध्यक्ष, उर्दू विभाग, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने ऑनलाइन सहभागिता की। विशिष्ट अतिथियों के रूप में डॉ. यूसुफ़ रामपुरी, सहायक प्रोफेसर, ज़ाकिर हुसैन कॉलेज, दिल्ली तथा डॉ. फ़रहत ख़ातून, अध्यक्ष, उर्दू विभाग, फ़ैज़-ए-आम इंटर कॉलेज, मेरठ उपस्थित रहीं।
कार्यक्रम में आयुसा की अध्यक्ष प्रो. रेशमा परवीन भी उपस्थित रहीं। शोध-पत्र प्रस्तुत करने वालों में नासिहा ख़ातून, शोधार्थी, लखनऊ विश्वविद्यालय तथा दरख़्शाँ चाँद, लखनऊ शामिल रहीं। डॉ. इफ़्फ़त ज़किया, अध्यक्ष, उर्दू विभाग, इस्माइल नेशनल महिला पीजी कॉलेज, मेरठ ने मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी सौदा के क़सीदे का प्रभावशाली पाठ किया। स्वागत भाषण मुहम्मद ईसा राना, संचालन फ़रहत अख़्तर तथा धन्यवाद ज्ञापन मुहम्मद नदीम ने किया। कार्यक्रम के विषय का परिचय कराते हुए डॉ. इरशाद स्यानवी ने कहा कि सौदा ने क़सीदे की परंपरा को सुदृढ़ किया। उनकी विशेषता यह है कि अन्य क़सीदा-लेखकों ने भी सौदा के क़सीदों से मार्गदर्शन प्राप्त किया। सौदा ने अनेक क़सीदे लिखे, लेकिन उनके 39 क़सीदे विशेष रूप से लोकप्रिय हुए। आज साहित्य की प्रत्येक गोष्ठी में सौदा की क़सीदा-निगारी पर विचार-विमर्श किया जाता है।
इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए आयुसा की अध्यक्ष प्रो. रेशमा परवीन ने कहा कि सौदा की विशिष्टता इस अर्थ में है कि उन्होंने ऐसे समय में क़सीदा-लेखन किया, जब इस विधा में विशेष कार्य नहीं हो रहा था। आज यह विधा सौदा की बदौलत बहुत लोकप्रिय है। नए विद्यार्थी क़सीदा-निगारी के संबंध में शोध के नए-नए आयाम सामने ला रहे हैं। सौदा ने अपने क़सीदों के माध्यम से तश्बीब और गुरेज़ में अनेक कलात्मक विशेषताएँ उत्पन्न कीं और इसी कारण अपने समकालीन साहित्यकारों में उन्हें उच्च स्थान प्राप्त हुआ। दरख़्शाँ चाँद ने अपना शोध-पत्र प्रस्तुत करते हुए कहा कि सौदा ने कदम-कदम पर तश्बीब का सहारा लेते हुए अपने क़सीदों की विशिष्टता को विकसित किया। उन्होंने कठिन और जटिल छंदों का भी अपने क़सीदों में प्रयोग किया।
दूसरी शोध-पत्र प्रस्तोता नासिहा ख़ातून ने अपने शोध-पत्र ‘क़सीदे का नक़्श-ए-अव्वल : मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी सौदा’ में कहा कि सौदा ने क़सीदे लिखने के साथ-साथ ग़ज़ल, नज़्म आदि विधाओं में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया, लेकिन उन्हें प्रसिद्धि मुख्य रूप से क़सीदा-लेखन के कारण मिली और उन्होंने इस विधा में विशेष दक्षता प्राप्त की।प्रो. नसीम अहमद ने कहा कि सौदा ने कुल 40 क़सीदे लिखे हैं। उन्होंने मर्सिए और ग़ज़लें भी लिखीं। सौदा के क़सीदों को लोग ठीक से समझ नहीं पाते। हमारा दायित्व है कि हम ऐसा कार्य करें, जिससे उनके क़सीदों को सभी समझें और पढ़ें। आज प्रस्तुत किए गए शोध-पत्र भी अच्छे थे।
डॉ. फ़रहत ख़ातून ने कहा कि उर्दू काव्य और साहित्य में सौदा किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उनके क़सीदों में उनके पतनशील समाज का चित्रण मिलता है। इन क़सीदों में शिकायत, ओज और प्रभावशाली अभिव्यक्ति दिखाई देती है तथा उनके क़सीदे श्रोताओं को प्रभावित करते हैं। कार्यक्रम के अंत में अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. सगीर अफ़राहीम ने कहा कि मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी सौदा ने ऐसे समय में क़सीदे लिखे, जब क़सीदा-लेखन के लिए वातावरण अनुकूल नहीं था। हसरत मोहानी ने जब सौदा के क़सीदों पर कार्य किया तो कहा था कि वे सौदा को क़सीदे का बादशाह मानते हैं। सौदा से पहले जाफ़र ज़टली क़सीदा लिख चुके थे। जब सौदा ने हज़रत फ़ातिमा, हज़रत अली और हज़रत हुसैन की प्रशंसा में क़सीदे लिखे, तो उनके समकालीन साहित्यकारों ने भी उनके क़सीदों को सम्मान की दृष्टि से देखा। वर्तमान समय में क़सीदे पर गंभीरता से कार्य करने वाले विद्वानों में प्रो. नसीम अहमद का महत्वपूर्ण स्थान है।
इस अवसर पर डॉ. इफ़्फ़त ज़किया ने अपने विशिष्ट अंदाज़ में सौदा के क़सीदे का प्रभावशाली पाठ भी किया।कार्यक्रम से डॉ. आसिफ़ अली, डॉ. शादाब अलीम, डॉ. अलका वशिष्ठ, मुहम्मद शमशाद, महविश, नायाब तथा अन्य छात्र-छात्राएँ ऑनलाइन जुड़े रहे।

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