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Thursday, October 8, 2026

"आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने"... क्रांतिवीर नाना पाटेकर नहीं रहे...

सपना सी.पी. साहू 

नित्य संदेश। भारतीय सिनेमा के अद्वितीय नटसम्राट और बेबाक अभिनेता नाना पाटेकर का जाना कला जगत और समाज के लिए एक ऐसी अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। 8 अक्टूबर 2026 को गोवा स्थित आवास पर कार्डियक अरेस्ट के कारण उनका निधन हो गया। घटना की सूचना के बाद अस्पताल और स्थानीय पुलिस द्वारा मेडिको-लीगल केस दर्ज कर शव को पोस्टमार्टम (गोवा मेडिकल कॉलेज) के लिए भेजने की कानूनी कार्रवाई की गई है।


असाधारण अभिनेता और साधारण पृष्ठभूमि से आने के बाद अपनी अलग पहचान बनाने वाले अभिनेता नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजिरा में हुआ। भले ही हम उन्हें नाना पाटेकर नाम से जानते है पर उनका नाम विश्वनाथ पाटेकर रखा गया। उन्होंने मुंबई के सर जे.जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट से पढ़ाई की और अपने शुरुआती जीवन में परिवार चलाने के लिए सड़कों पर पोस्टर्स पेंट करने से लेकर कई कड़े संघर्ष देखे। 


उन्होंने अपने अभिनय सफर की शुरुआत थिएटर से की, उन्होंने फिल्म जगत के उस दौर को बदला जिसमें एक्टर बनने के लिए शक्ल महत्वपूर्ण समझी जाती थी। उनकी दमदार आवाज़ और स्वाभाविक संवाद शैली ने सभी का ध्यान खींचा।


वर्ष 1978 में फिल्म 'गमन' से हिंदी सिनेमा में कदम रखने के बाद उन्होंने 'परिंदा', 'क्रांतिवीर', 'अग्नि साक्षी' और 'अपहरण' जैसी फिल्मों में अपने किरदारों से अभिनय की नई परिभाषा तय की, तो वहीं मराठी सिनेमा की 'नटसम्राट' और 'डॉ. प्रकाश बाबा आमटे' में उनके अभिनय ने हर किसी को भावुक कर दिया। 'वेलकम' और 'हाउसफुल' जैसी फिल्मों में उनकी कॉमेडी टाइमिंग ने भी दर्शकों का दिल जीता। अपने इस बेमिसाल अभिनय के लिए उन्हें तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, कई फिल्मफेयर पुरस्कार और वर्ष 2013 में भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया।


नाना पाटेकर केवल पर्दे के नायक नहीं थे, बल्कि वास्तविक जीवन में भी एक सच्चे जनसेवक थे। उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर 'नाम फाउंडेशन' की स्थापना की और महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्रों के किसानों व उनके परिवारों को संबल प्रदान किया।


पर्दे पर जीवंत अभिनय के लिए उन्हें कभी आडंबर की आवश्यकता नहीं पड़ी; उनकी आँखें, आवाज़ का उतार-चढ़ाव और सादगी भरा अंदाज़ ही दर्शकों को बाँधने के लिए पर्याप्त था। 'क्रांतिवीर' की तीखी संवाद अदायगी हो या 'नटसम्राट' की वेदना, वे किरदार निभाते नहीं बल्कि उन्हें जीते थे। स्टारडम की चकाचौंध से दूर ज़मीन से जुड़े रहकर अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा समाज सेवा में समर्पित कर देना उनके विशाल हृदय का प्रमाण था।


उनका काम, उनके विचार और उनका सादगीपूर्ण जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा स्रोत बना रहेगा। ऐसे महान कलाकार और संवेदनशील इंसान को कोटि-कोटि नमन व भावभीनी श्रद्धांजलि।




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