नित्य संदेश। आज 2 अक्टूबर है। भारत राष्ट्र पिता महात्मा गांधी की जयंती मना रहा है। सरकारी कार्यक्रम होंगे, गांधी जी की प्रतिमाओं पर पुष्प अर्पित किए जाएंगे, उनके विचार दोहराए जाएंगे और अहिंसा, सत्य, सहिष्णुता तथा राष्ट्रीय एकता की बातें की जाएंगी।
लेकिन इसी दिन हमारे सामने एक सवाल भी खड़ा होता है
अगर आज गांधी जी ज़िंदा होते और भारत की वर्तमान स्थिति को अपनी आंखों से देखते, तो वे क्या सोचते? क्या कहते? यह सवाल किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विरोध में नहीं, बल्कि भारत की आत्मा से जुड़ा हुआ सवाल है।
गांधी जी ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में सांप्रदायिक नफ़रत के खिलाफ जिस दृढ़ता से आवाज़ उठाई, वह इतिहास का हिस्सा है। 1946-47 में जब सांप्रदायिक हिंसा ने बंगाल, बिहार, दिल्ली और दूसरे क्षेत्रों को प्रभावित किया, तो गांधी जी ने आराम की ज़िंदगी बिताने के बजाय प्रभावित क्षेत्रों का रुख किया। नोआखाली में वे गांव-गांव पैदल गए और लोगों के बीच शांति तथा विश्वास बहाल करने का प्रयास किया।
यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि 2 अक्टूबर 1947, यानी उनके जीवन का अंतिम 2 अक्टूबर, गांधी जी ने नई दिल्ली में बिताया और उसी दिन उनकी प्रार्थना सभा के बाद दिए गए भाषण का रिकॉर्ड गांधी हेरिटेज पोर्टल पर उपलब्ध है।
आज अगर वे हमारे बीच होते तो शायद सबसे पहले यह पूछते कि आज़ादी के बाद जिस भारत का सपना देखा गया था, उसमें इंसान की पहचान उसके धर्म, पहनावे और नाम से क्यों होने लगी? अगर किसी व्यक्ति की दाढ़ी, टोपी, कुर्ता-पायजामा या किसी महिला के बुर्के को देखकर नफ़रत पैदा होने लगे, तो समस्या पहनावे में नहीं, मन में पैदा हुई नफ़रत में है।
मुसलमान मस्जिद में नमाज़ पढ़ता है तो यह उसका धार्मिक अधिकार है। हिंदू मंदिर में पूजा करता है तो यह उसका धार्मिक अधिकार है। सिख गुरुद्वारे में जाता है, ईसाई चर्च में इबादत करता है। भारत की खूबसूरती ही उसकी इस विविधता में है। फिर यह कैसी स्थिति है कि मस्जिद के नीचे मंदिर तलाशने की होड़ लग जाए? अगर इबादतगाहें इबादत के बजाय विवाद का केंद्र बन जाएं, तो नुकसान केवल किसी एक धर्म का नहीं, बल्कि पूरे समाज का होता है। इसी तरह किसी भी इंसान को उसके धर्म के आधार पर मार देना, भीड़ द्वारा कानून को अपने हाथ में ले लेना या केवल शक के आधार पर किसी की जान ले लेना—ये सब कानून, इंसानियत और सभ्यता के मूल सिद्धांतों के सामने गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
यहां यह बात भी ज़रूरी है कि किसी भी अपराध को पूरे धर्म या पूरी बिरादरी से जोड़ना उचित नहीं। अपराधी का संबंध जिस धर्म, जाति या समुदाय से हो, अपराध की ज़िम्मेदारी उसी व्यक्ति या व्यक्तियों पर होनी चाहिए। न मुसलमान को हिंदू से डरना चाहिए और न हिंदू को मुसलमान से। भारत किसी एक धर्म की जागीर नहीं है; यह करोड़ों इंसानों का साझा वतन है।
गांधी जी के जीवन का एक बड़ा संदेश यही था कि नफ़रत का जवाब और अधिक नफ़रत से नहीं दिया जा सकता। वे सांप्रदायिक दंगों के दौर में भी दोनों पक्षों के लोगों से शांति, संयम और इंसानियत की अपील करते रहे। अप्रैल 1947 में बिहार में उनके प्रयासों के दौरान गांधी और मुहम्मद अली जिन्ना की संयुक्त अपील भी सामने आई थी, जिसमें सांप्रदायिक हिंसा की निंदा और शांति से रहने की अपील की गई थी।
आज हमें गांधी जी की प्रतिमा पर फूल चढ़ाने से अधिक उन सिद्धांतों पर विचार करने की आवश्यकता है, जिनकी वे बात करते थे।
क्या अहिंसा केवल भाषणों का विषय है?
क्या धार्मिक सहिष्णुता केवल सरकारी कार्यक्रमों तक सीमित है?
क्या राष्ट्रीय एकता केवल नारों तक सीमित रह जाएगी?
और सबसे बड़ा सवाल
अगर आज गांधी हमारे बीच आकर देखते कि एक भारतीय दूसरे भारतीय को उसके धर्म के नाम पर शक की निगाह से देख रहा है, किसी के पहनावे से नफ़रत की जा रही है, इबादतगाहें राजनीतिक विवादों का केंद्र बन रही हैं और समाज में धार्मिक दूरियां बढ़ रही हैं, तो क्या उनका दिल संतुष्ट होता?
हम गांधी जी की आत्मा की ओर से ऐसा कोई वाक्य नहीं कह सकते, जो उन्होंने कहा ही नहीं। लेकिन उनके जीवन, उनकी संघर्षपूर्ण यात्रा और 1946-47 के सांप्रदायिक संकट के दौरान उनकी भूमिका को देखते हुए यह सवाल ज़रूर किया जा सकता है कि क्या वे भारत को फिर उस रास्ते पर लाने का प्रयास नहीं करते, जहां इंसान को सबसे पहले इंसान समझा जाए?
शायद 2 अक्टूबर का असली संदेश यही है
गांधी को याद करना केवल उनकी तस्वीर पर माला चढ़ाना नहीं, बल्कि अपने भीतर के पूर्वाग्रहों से सवाल करना भी है।
अगर भारत में मस्जिद भी सुरक्षित हो, मंदिर भी सुरक्षित हो, गुरुद्वारा भी सुरक्षित हो और चर्च भी; अगर मुसलमान अपनी दाढ़ी और टोपी के साथ बेखौफ़ चल सके, हिंदू अपनी धार्मिक पहचान के साथ सुरक्षित रहे, सिख अपनी पगड़ी के साथ सम्मान से जी सके और ईसाई अपनी इबादतगाह में स्वतंत्रता से प्रार्थना कर सके तो यही भारत की वास्तविक खूबसूरती होगी।
2 अक्टूबर हमें गांधी की ही नहीं, अपने ज़मीर की भी याद दिलाता है।
आइए, आज के दिन यह संकल्प लें कि मतभेद होंगे, लेकिन दुश्मनी नहीं; बहस होगी, लेकिन नफ़रत नहीं; धार्मिक पहचान होगी, लेकिन पूर्वाग्रह नहीं। और विचारों में मतभेद के बावजूद एक-दूसरे के जीवन, संपत्ति, सम्मान और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का सम्मान करेंगे।
क्योंकि भारत केवल नक्शे पर बनी हुई एक सीमा का नाम नहीं है; भारत करोड़ों दिलों का नाम है।
और जब दिलों के बीच नफ़रत की दीवारें खड़ी हो जाती हैं, तो आज़ादी का उत्सव भी अधूरा रह जाता है।
लेखक: महबूब हसन महबूब मुज़फ़्फ़रनगरी
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