नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। विक्टोरिया गार्डन स्थित निज निवास 11-जी में रविवार को सामवेद की दशमी कथा के प्रथम दिवस का शुभारंभ हुआ। कथा व्यास पारुल मित्तल ने नवम प्रपाठक की कथा से कथा का प्रारंभ किया।
कथा व्यास ने कहा कि सामवेद चार वेदों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारतीय संगीत शास्त्र के इतिहास में भी इसका विशेष महत्व है। गीता में श्रीकृष्ण के वचन "वेदेषु सामवेदोऽहम्" से ही इसका महत्व स्पष्ट होता है। सामवेद में 1875 मंत्र हैं। प्रथम दिवस की कथा में उन्होंने सोम, इंद्र और अग्नि के स्वरूप एवं गुणों का वर्णन किया। उन्होंने कहा - हे सोम! आपके रस का बल बढ़ाने वाली धाराएं समुद्र के समान कलश में स्थित हो रही हैं, आप इस कलश को पूर्ण कीजिए। यहां समुद्र विशाल सोमपात्र के साथ असीम ग्रहणशीलता का प्रतीक है। सोम का शोधन मन की शुद्धि और तेज चेतना के प्रकाश तथा पात्र को भरना ऊर्जा से जीवन को भरने का प्रतीक है।
इंद्र के विषय में बताते हुए कहा कि हे इंद्र! आप बलशाली, वज्रधारी, वृत्रहंता हैं। जो लोग सदाचार और कल्याण की भावना से आपकी ओर आते हैं और कृपा की प्रार्थना करते हैं, उन्हें अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं। अग्नि की स्तुति करते हुए उन्होंने कहा कि अग्नि यजमानों द्वारा निर्मित यज्ञकुंडों को प्रदीप्त करती है। अग्नि ऊर्जा और परिवर्तन की शक्ति, प्रेरणा और उत्साह का प्रतीक है। ज्योति ज्ञान है। अग्नि से प्रार्थना है कि वह हमारे भीतर की नकारात्मकता और अहंकार को भस्म कर दे। इस प्रकार कथा व्यास ने वर्तमान संदर्भ में वैदिक देवताओं के स्वरूप को प्रतीकात्मक रूप में समझाया और भजनों के माध्यम से कथा को सरस व रोचक बनाया।

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