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Saturday, September 5, 2026

आता थांबवायचं कसं ने दिखाया मोबाइल की स्क्रीन के पीछे का बेचैन करने वाला सच

सानंद के मंच पर डॉ गिरीश ओक और सुकन्या कुलकर्णी का अविस्मरणीय अभिनय


नवीन मौर्य

नित्य संदेश, इंदौर। सानंद न्यास के पांच दर्शक समूह के लिए डॉ गिरीश ओक अभिनीत नाटक ''आता थांबवायचं कसं ?’' का मंचन शनिवार शाम से प्रारंभ हुआ। दरअसल,मोबाइल की स्क्रीन पर उंगलियां चलाते हुए हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि आभासी दुनिया में दर्ज किया गया एक क्षण वास्तविक जीवन में कितनी दूर तक हमारा पीछा कर सकता है।


एक तस्वीर, एक वीडियो, एक संदेश या महज एक क्लिक,क्षण भर की असावधानी कभी-कभी जीवन की दिशा बदल देने वाली घटना बन जाती है। निजी और सार्वजनिक के बीच की रेखा जब धुंधली पड़ने लगती है, तब तकनीक सुविधा से आगे बढ़कर संकट का रूप ले लेती है। ‘आता थांबवायचं कसं ?’ इसी भयावह संभावना को एक मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी के माध्यम से रंगमंच पर साकार करता है।

अरुण और रमा पिंपलकर का परिवार बाहर से देखने पर बिल्कुल हमारे-आपके परिवार जैसा है,सुखी, सहज और आत्मीय। बेटी तन्वी, बेटा चिराग और अरुण की मां के साथ जीवन अपनी लय में आगे बढ़ रहा है। तन्वी के विवाह में महज पंद्रह दिन शेष हैं। 


घर में उत्सव का वातावरण है, तैयारियों की चहल-पहल है और आने वाले सुखद भविष्य के सपने हैं। तभी तन्वी से हुई एक चूक इस पूरे संसार को जैसे एक झटके में तहस-नहस कर देती है। जो घर कुछ क्षण पहले हंसी से भरा था, वहां भय, तनाव, सामाजिक दबाव और असमंजस का अंधेरा उतर आता है। ‘अब आगे क्या ?’ का प्रश्न पात्रों के साथ दर्शक के भीतर भी बेचैनी पैदा करता है।

लेखक-निर्देशक संदीप दंडवते की विशेषता यह है कि वे इस घटना को केवल तकनीक के दुष्परिणाम के रूप में नहीं देखते। उनके लिए असली प्रश्न तकनीक नहीं, उसके साथ बदलता मनुष्य है। सोशल मीडिया पर निजी जीवन को सहजता से सार्वजनिक कर देना, आभासी दुनिया में सीमाओं का विस्मरण, क्षणिक आवेग में निर्णय लेना और फिर उसके सामाजिक एवं मानसिक परिणामों से जूझना—नाटक इन सभी स्तरों को छूता है। ‘निर्जीव फोन स्मार्ट होता जा रहा है और जीवित इंसान मूर्ख और बेवकूफ’ जैसा संवाद नाटक के मूल सरोकार को तीखे ढंग से सामने रखता है।

नाटक की सार्थकता केवल संकट की भयावहता में नहीं, बल्कि उस संकट के बीच परिवार की भूमिका में भी है। गलती करने वाले बच्चे को कटघरे में खड़ा करना आसान है, लेकिन उसके साथ खड़े रहकर उसे संकट से बाहर निकालना कहीं अधिक कठिन। नाटक का पिता इसी कठिन रास्ते को चुनता है। सामाजिक प्रतिष्ठा, लोकलाज और ‘लोग क्या कहेंगे’ की मानसिकता से ऊपर उठकर बेटी का हाथ थामने वाला पिता इस कथा को एक मानवीय आयाम देता है। यहां नाटक उपदेश नहीं देता, बल्कि एक कठिन सवाल हमारे सामने रखता है कि संकट में बच्चे से गलती हो जाए तो क्या हम उसके न्यायाधीश बनेंगे या उसका सहारा ? संदीप दंडवते का निर्देशन इसी संयम के कारण प्रभावी बनता है। संवेदनशील विषय को उन्होंने अनावश्यक भावुकता या सस्ते नाटकीय प्रभावों के हवाले नहीं किया। घटनाओं का क्रम स्वाभाविक है, संवाद सहज हैं और पात्रों की मानसिक स्थिति धीरे-धीरे खुलती है। यही यथार्थपरकता दर्शक को कहानी से बाहर खड़े होकर देखने नहीं देती; वह अनायास उस परिवार के भीतर प्रवेश कर जाता है। 

गंभीर विषय होने के बावजूद नाटक बोझिल नहीं होता। डॉ. गिरीश ओक ने पिता की भूमिका में अपने अभिनय की परिपक्वता का परिचय दिया है। भीतर से टूटता हुआ, लेकिन बेटी के सामने मजबूत बने रहने की कोशिश करता पिता उनके अभिनय में बेहद स्वाभाविक दिखाई देता है। सुकन्या मोने ने मां के भावनात्मक द्वंद्व को उतनी ही सहजता से पकड़ा है। ‘कुसुम मनोहर लेलें’ के करीब तीन दशक बाद दोनों का फिर एक साथ मंच पर आना सुखद संयोग है और उनकी अभिनय-संगति नाटक को विशेष ऊंचाई देती है। तन्वी के रूप में ऐश्वर्या शेटे ने अपनी भूमिका के भावनात्मक उतार-चढ़ाव को प्रभावी ढंग से जिया है। चिराग की भूमिका में आकाश पाटील सहज हैं। जान्हवी पणशीकर की आजी अप्रत्याशित ढंग से नाटक में एक अलग रंग भरती है और उनका चरित्र दर्शकों के लिए उत्सुकता का कारण बनता है।

आता थांबवायचं कसं ?’ का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह डिजिटल दुनिया को खारिज नहीं करता, बल्कि उसके साथ जिम्मेदारी से जीने की जरूरत रेखांकित करता है। आज की युवा पीढ़ी को स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच का अंतर समझने की जरूरत है, तो अभिभावकों को भी यह समझना होगा कि बच्चों की हर गलती पर उन्हें अकेला छोड़ देना समाधान नहीं है। एक क्षण की डिजिटल असावधानी किस तरह पूरे परिवार को संकट में डाल सकती है और उसी संकट में परिवार की एकजुटता किस तरह उम्मीद का रास्ता खोल सकती है,नाटक इसी द्वंद्व को प्रभावी ढंग से सामने लाता है। इस अर्थ में ‘आता थांबवायचं कसं?’ केवल एक नाटक नहीं, हमारे समय के बदलते पारिवारिक और सामाजिक संबंधों का आईना है। यह मनोरंजन के बाद दर्शक को खाली नहीं लौटाता; उसके साथ एक बेचैनी, एक सवाल और शायद अपने ही जीवन को लेकर थोड़ी-सी सावधानी घर तक भेजता है। मोबाइल की स्क्रीन बंद होने के बाद भी जो प्रश्न भीतर जलता रहे, वही इस नाटक की सबसे बड़ी सफलता है।

कलाकार 

सुकन्या कुलकर्णी मोने, जान्हवी पणशीकर, आकाश पाटील, ऐश्वर्या शेटे आणि डॉ. गिरीश ओक


बैकस्टेज आर्टिस्ट्स 

लेखक-दिग्दर्शक : संदीप दंडवते

नेपथ्य : संदेश बेंद्रे

प्रकाश योजना : रत्नकांत जगताप

गीत : विघ्नेश जोशी

संगीत : समीर म्हात्रे

वेशभूषा : अमृता काकतकर

निर्माता : समृद्धी तांबे, गंधाली कुलकर्णी, सुनंदा काळुसकर, प्रवीण भोसले आणि भरत नारायणदास ठक्कर

सूत्रधार : दीपक गोडबोले


रविवार को 3 शो


सानंद न्यास के अध्यक्ष जयंत भिसे और मानद सचिव संजीव वावीकर ने बताया कि

 नाटक ''आता थांबवायचं कसं ?’' का मंचन

6 सितंबर रविवार को मामा मुजुमदार के लिये प्रातः 10 बजे , वसंत समूह के लिये अपराह्न 4 बजे एवं सायं 7.30 बजे बहार समूह के लिये होगा।

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