Wednesday, September 9, 2026

मन्नत—डॉ. शबनम सुल्ताना की कविता

नित्य संदेश

मन्नत

जब-जब पुकारा,

तुम्हें ही बुलाया,

मेरी दुआ का मरकज़ तुम,

मेरी हर इबादत का नूर तुम।


फिर क्यों माँगती हूँ मैं,

मन्नतें?

जानती हूं कि,

तुम जानते हो मेरे दिल

का हाल,

मेरी ख़ामोशी की हर आहट,

मेरे मन का हर अनकहा सवाल।


रब की अदालत में,

एक दिन मेरी भी 

सुनवाई होगी,

जैसे पूरी होती हैं

सबकी दिली मुरादें,

वैसे ही मेरी भी

दुआ कबूल होगी।


तुमसे क्या छिपा है?

जानते हो तुम,

मेरे मन की हर बात,

बस इसी विश्वास पर

ठहरे हैं जिंदगी के हालात,


कभी तो मेरी मन्नत 

पूरी होगी,

और तब...

मेरे दिल की बात,

तुम्हारे दिल को भी

कबूल होगी।



डॉ. शबनम सुल्ताना

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