Tuesday, September 8, 2026

धंधा ​— डॉ. शबनम सुल्ताना की लघुकथा

 
नित्य संदेश 

धंधा

"अरे मौलवी साहब आज यहां कैसे"

पेड़ की मोटी डाल को अपना बैठक बनाए पंडित जी तेज आवाज में हांक लगाते हुए बोले।

​"आपको ही ढूंढते हुए आए, पता चला आप अक्सर यहां ध्यानमग्न होने आते हैं।"

​पंडित जी, "क्या करें मौलवी साहब, आजकल मन बहुत खराब चल रहा है।"

​मौलवी साहब, "क्या बात हुई है।"

​पंडित जी बात काटकर, "मेरी छोड़ो, आज कैसे आना हुआ।"

​मौलवी साहब बेचैनी से बोले, "क्या करूं पंडित सुमित, बहुत दिमाग खराब हुआ पड़ा है। सोशल मीडिया ने काम खराब कर दिया है, धंधा ही नहीं चल रहा।"

​पंडित जी, "यही हाल मेरा है। इसलिए तो यहां आ जाता हूं, दिल घबरा गया है। यजमान हर चीज में यूट्यूब और इंस्टाग्राम खोल लेते हैं।"

​मौलवी साहब, "पंडित सुमित, अनपढ़ तो ठीक, पढ़े-लिखे भी हमारे आगे सर न उठाते थे। और अब समझ नहीं आ रहा क्या करें भैया।"

​पंडित सुमित, "कुछ तो करना होगा भैया।"

​कुछ दिनों बाद न्यूज़ चल रही थी—

"मज़हबी लड़ाइयों से परेशान देश को एकता का संदेश देने एक साथ पॉडकास्ट में आए मौलवी शहज़ाद खान और पंडित सुमित शुक्ला।"



​— डॉ. शबनम सुल्ताना

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