
नित्य संदेश
इंदौर में जो कार्यक्रम पहले 12 सितम्बर को होना था, उसे इंदौरी कांग्रेसी नेताओं ने खींच-तानकर, लोगो से अथक मान-मनौव्वल की तमाम कसरतों, नाच-गाकर भीड़ जुटाने का प्रयास किया ताकि मैदान में सिरों की एक बड़ी संख्या दिखाई जा सके। गाड़ियों के लंबे काफिले, कार्यकर्ताओं का दिन-रात पसीना बहाना और गांव-देहात से संसाधनों के बल पर लोगों को बुलाना—इतने सारे तमाशे के बाद इंदौर के अटल बिहारी रीजनल पार्क में 19 सितम्बर को भीड़ तो जुटा ली, लेकिन इस भारी-भरकम कवायद का अंत क्या निकला? नतीजा वही—खोदा पहाड़ और निकली चुहिया।
इतनी मेहनत के बाद जब 'छात्रों की गूंज' का मंच सजा, तो उम्मीद थी कि देश की सबसे पुरानी पार्टी के बड़े नेता युवाओं, शिक्षा, रोजगार और देश के भविष्य पर कोई गंभीर सोच रखेंगे। लेकिन मंच संभालते ही गंभीरता दूर-दूर तक नजर तक नहीं आई।
गंभीरता की जगह ली वही पुरानी फालतू की मसखरी, अनर्गल चुटकुलों और अपरिपक्व बालक जैसी हरकतों ने। कमेडियन पुलकित मणी और राहुल गांधी ने मोदी जी की मिमिक्री करके मां अहिल्या की पावन नगरी में 'मां' शब्द पर जो असंवेदनशीलता दिखाई, उसने सभी को आहत किया। यह कोई कॉमेडी का विषय नहीं था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस पार्टी में खुद उनकी मां सोनिया गांधी राष्ट्रगीत के सम्मान में खड़े होने के बजाय कुर्सी मंगवाने लगती थीं, वे दूसरों को क्या सिखाएंगे?
प्रधानमंत्री का अनौपचारिक अंदाज में मजाक उड़ाना और विदेश नीति जैसे गंभीर मुद्दे को केवल 'गले मिलने' जैसी तुच्छ बातों तक सीमित कर देना यह साफ दिखाता है कि इतने सालों के बाद भी उनमें राजनीतिक परिपक्वता का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं है।
इतना ही नहीं, मंच से देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल जी की मानहानि करना और उनके खिलाफ अनर्गल बयानबाजी करना भी अत्यंत निंदनीय था। ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस को देश के प्रति पूरी निष्ठा और ईमानदारी से सेवा करने वालों से नफरत है, परंतु इस तरह की हल्की बयानबाजी करके वे किसी और का नहीं, बल्कि खुद अपना ही कद लोगों की नजरों में छोटा कर लेते हैं।
सच्चाई राहुल गांधी के दावों के बिल्कुल विपरीत है। भाजपा सरकार छात्रों की आवाज़ सुनती भी है, समझती भी है और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए निरंतर काम कर रही है। कांग्रेस ने जिन 70 सालों में युवाओं को केवल वादों में उलझाए रखा, उसके मुकाबले बीते 12 सालों में परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। आज देश में नए-नए स्टार्टअप्स को बढ़ावा देकर युवाओं को नौकरी मांगने वाला नहीं, बल्कि नौकरी देने वाला बनाया जा रहा है।
यूनिवर्सिटीज, आईआईटी और आईआईएम का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है और समान अवसर दिए जा रहे हैं। रही बात शिक्षा और फीस की, तो कार्यक्रम के दौरान ही एक छात्र ने खुद स्वीकार किया कि सरकारी स्कूलों और कॉलेजों की फीस आज भी आम छात्रों की पहुंच में बेहद सस्ती और किफायती है। रही बात प्राइवेट संस्थानों की, तो वह माता-पिता की अपनी पसंद और निर्णय पर निर्भर करता है।
इसके बावजूद, राहुल गांधी 'एवरेज' छात्रों को नौकरी देने की अजीबोगरीब बातें कर रहे थे। इसका सीधा अर्थ तो यही निकलता है कि अब योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि अयोग्यता देखकर नौकरियां बांटी जाएं! इस तरह की उल-जुलूल और तर्कहीन बातें करना पूरी तरह गलत है। बिना तथ्यों के केवल ऐसी जुमलेबाज़ी करना देश के जागरूक युवाओं को गुमराह करने जैसा ही है।
दूसरी ओर जब बोलने का मौका मिला, तो देश के प्रतिभाशाली युवाओं को आगे बढ़ाने या मेरिट की बात करने के बजाय वे फिर से वही पुराना आरक्षण और जातिगत विभाजन का राग अलापने लगे।
उनका पूरा भाषण प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से एक तरह से 'स्वर्ण-विरोधी' मानसिकता से ही लबरेज़ दिखा। जहां आज का युवा योग्यता, निष्पक्ष अवसर और आधुनिक शिक्षा की उम्मीद कर रहा है, वहां मंच से खुलेआम केवल विभाजनकारी बातें करना सवर्ण जनता में निराशा को भर गया।
सवाल यह उठता है कि क्या देश का सामान्य और सवर्ण समाज केवल टैक्स भरने के लिए है? उनके बच्चों के भविष्य की चिंता आखिर कौन करेगा जब विपक्ष खुद योग्यता को नकार कर केवल विभाजन का एजेंडा चलाने में लगा हुआ है? मोदी सरकार ने तो EWS लागू करवाया है, लेकिन राहुल गांधी ने तो झूठ बोला कि आदिवासियों, दलितों, गरीब छात्रों, महिलाओं की अनदेखी हो रही है। जबकि राहुल गांधी के आगमन पर इंदौर की महिलाओं ने नारी सम्मान बिल न पास होने देने का विपक्ष के प्रति विरोध दर्ज करवाया।
खैर, इतना बड़ा मंच, इतनी मशक्कत से जुटाई गई भीड़ और सामने था अपनी राजनीतिक समझ साबित करने का एक बेहतरीन मौका। लेकिन राहुल गांधी ने फिर वही गलती दोहराई और अपनी बचकानी और दिशाहीन बयानबाजी से साबित कर दिया कि वे देश के युवाओं की असल समस्याओं को समझने में कितने नकारा हैं। कुल मिलाकर, इंदौर में आयोजित यह पूरा घटनाक्रम 'छात्रों की गूंज' नहीं, बल्कि 'झूठ और अपरिपक्वता की गूंज' बनकर ही रह गया।
—सपना सी.पी. साहू 'स्वप्निल'



No comments:
Post a Comment