नित्य संदेश
भारतीय हिंदू धर्म और संस्कृति में गुरु शिष्य परंपरा के अंतर्गत गुरुकुल में 64 कलाएं सिखाई जाती थी, वर्तमान समय में हम समझे और जाने की भी 64 कलाएं हमारे जीवन के हर पहलू से जुड़ी हुई थी, जिनका हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक संबंध होता था और अभी भी है। हमारे जीवन से जुड़ी में 64 कलाएं हैं-
प्रमुख 64 कलाओं के नाम
गीत गाना गायन विद्या, वाद्य बजाना विभिन्न संगीत यंत्र, नृत्य करना, नाट्य/अभिनय कला, चित्रकारी पेंटिंग, विशेषक-च्छेध्यम शरीर या चेहरे पर रंग और आभूषणों की सजावट, तंदुल-कुसुम-बली-विकार चावल और फूलों से फर्श पर सुंदर आकृतियां बनाना, पुष्पास्तरणम फूलों की सेज या बिस्तर बनाना, दशनावासनांग-राग दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना, मणि-भूमिका-कर्म मणियों और रत्नों से फर्श या सतह सजाना, शय्या-रचना बिस्तर की सज्जा, उदक-वाद्य जल तरंग या पानी के बर्तनों से संगीत बजाना, उदक-घात पानी से खेलना या छींटे मारना, चित्र-योग रंगों को आपस में मिलाना व डिजाइन बनाना, माल्य-ग्रथन-विकल्प सुंदर फूलों के हार और गजरा गूंथना, शेखर-पीड-योजन मस्तक के फूलों की सजावट - सिर के आभूषण बनाना, नेपथ्य-प्रयोग वेशभूषा और श्रृंगार की कल, कर्ण-पत्र-भंग कानों के लिए आभूषण या कर्णफूल बनाना, गंध-युक्ति इत्र, सुगंध और सेंट बनाना, भूषण-योजन गहने पहनने और बनाने की कला, इन्द्रजाल जादू और नजरबंदी के खेल, कौमार-तन्त्र बाल चिकित्सा और बाल देखरेख, हस्त-लाघव हाथ की सफाई व तेजी से काम करना, विचित्र-शाक-भक्ष्ण-विकार स्वादिष्ट भोजन, पकवान और विभिन्न प्रकार की सब्जियां बनाना, पान-रस-राग-सोजन विभिन्न प्रकार के शर्बत, पेय और आसव तैयार करना, सूचिका-कर्म सिलाई, कढ़ाई और रफू करना, सूची-वाण-कर्म बुनना और ताना-बाना बुनना, प्रहेलिका पहेलियां बुझाना और रचना करना, प्रतिमाला श्लोकपूर्ति और काव्यात्मक प्रतियोगिता, दुर्वाचक योग कठिन शब्दों का उच्चारण या अर्थ निकालना,पुस्त-वाचन ग्रंथों और पुस्तकों का सुंदर पठन, नाटक-दर्शन नाटक की रचना और मंचन की समझ, काव्य-समस्या-पूरण अधूरे काव्य या श्लोक को पूरा करना, पट्टिका-वेत्र-बान-विकल्प बेंत और चटाई बुनना, तर्क-कर्म तर्क-वितर्क और शास्त्रार्थ की कला, तक्षणा बढ़ईगिरी और लकड़ी का काम, वास्तु-विद्या भवन निर्माण और वास्तुकला, रौप्य-रत्न-परीक्षा सोने, चांदी और हीरों की परख करना, धातु-वाद धातुओं को पिघलाने और उनके मिश्रण की कला, मणि-राग-ज्ञान मणियों को रंगने और परखने की कला, आकर-ज्ञान खान और खनिजों की पहचान करना, वृक्ष-आयुर्वेद-योग पौधों और वृक्षों की देखभाल, खाद और चिकित्सा, मेष-कुक्कुट-लावक-युद्ध-विधि भेड़, मुर्गे आदि के युद्ध का ज्ञान व प्रबंधन, शुक-सारिका-प्रलापन तोते और मैना को बोलना सिखाना, उत्सादने शरीर की मालिश और उबटन करना, केश-मर्दन-कौशल बालों को संवारना और चंपी करना, अक्षर-मुष्टिका-कथन अंगुलियों के इशारों से बात करना, म्लेच्छित-कविकल्प विदेशी या अस्पष्ट बोलियों और भाषाओं का ज्ञान, देश-भाषा-ज्ञान विभिन्न प्रान्तों की बोलियों का ज्ञान, पुष्प-शकटिका फूलों की गाड़ियां या खिलौने बनाना, यंत्र-मात्रिका यंत्रों और मशीनों की रचना, धारण-मात्रिका स्मरण शक्ति बढ़ाना और ताबीज/मंत्रों का ज्ञान, सम्भाषण बातचीत करने की कला और संवाद कौशल, मानस-काव्य मन ही मन कविता की रचना करना, क्रिया-विकल्प किसी कार्य को जल्दी या वैकल्पिक तरीके से करना, छलितक-योग छल, इंद्रजाल या दृष्टि भ्रम के उपाय, अभिधान-कोश शब्दकोश और छंदों का ज्ञान, वस्त्र-गोपन वस्त्रों को छिपाने या बदलने की कला, द्यूत-विशेष जूआ या पासे के खेल की बारीकियां, आकर्षण-क्रीड़ा चुंबक या पासों से खेलने की कला, बाल-क्रीड़ा बच्चों के खिलौने और खेल तैयार करना, वैजयिकी विद्या विजय प्राप्त करने और युद्ध कौशल की नीति, विनयकी विद्या, शिष्टता, अनुशासन और विनम्रता का ज्ञान, व्यायामिकी विद्या शारीरिक व्यायाम और स्वास्थ्य विज्ञान।
इन 64 कलाओं के बारे में वर्तमान समय में बात करने करने का अर्थ यह है, कि आज हम जिन कामों को छोटा समझकर अनदेखा कर देते हैं। प्राचीन गुरुकुल शिष्य परंपरा में वही कार्य कला के रूप में शिक्षा पद्धति में शामिल थे। जिन्हें बारीकी से सीख कर उसमें महारत हासिल कर लेते थे। इस प्रकार हम 64 कलाओं को सीख कर 64 काम करने में पारंगत हो सकते हैं। हर काम को कला की तरह सीख कर, हम स्मार्ट बन सकते हैं, जो हर काम को अच्छी तरह कर सकता है। इसका मतलब, एक एक्सपर्ट जो इतने सारे काम अच्छे तरीके से कर सके। अच्छे तरीके से मतलब सही तरीका जब आप किसी काम को विद्या की तरह सीखते हैं तो उसे करने का सरल तरीका सीखने हैं और सीढ़ी दर सीढ़ी उसे, कैसे सीखा जाता है, यह उसे उसका गुरु या उस्ताद बताता है।
साहित्य समाज का दर्पण होता है, अर्थात समाज में अच्छा बुरा जो भी होता है। वह साहित्य के माध्यम से प्रतिबिंबित होता है। हमारे माता-पिता, दादा-दादी, नाना नानी के समय में वह लोग कुछ अलग खाते पीते थे, पहनते थे, काम करने के तरीके अलग थे। हम उनके मुंह से सुनते हैं कि हम ऐसा खाते थे, ऐसा पीते थे, ऐसा पहनते थे, लेकिन वह चीज प्रामाणिक रूप में हमें साहित्य के माध्यम से ही मिलती है। जब वह पीढ़ी खत्म हो जाएगी, तो हम साहित्य के माध्यम से ही उसे समय को जान पाएंगे। समय स्थान विशेष की आर्थिक, सामाजिक, व्यवसायिक, भौगोलिक, आध्यात्मिक, आर्थिक जानकारी साहित्य के माध्यम से ही मिल पाती है। अभी का साहित्य भी समय के साथ परिवर्तित हो गया, आज की जनरेशन फास्ट है, जिसे कम समय में जंक फूड जैसे खाकर जल्दी पेट भरना है, उसी प्रकार लंबी-लंबी कहानी, कविताओं को ना पढ़ते हुए, लघु कथा और छोटी कहानियों, कविताओं को पढ़ना ज्यादा पसंद करते हैं। साहित्य में विराम चिन्ह का प्रयोग कम किया जाने लगा है। अगर उन्हें न भी लगाया जाए तो उन पर कोई ध्यान नहीं देता। लेकिन यह गलत है, लंबे और निरर्थक निबंधों की जगह सटीक और संक्षिप्त निबंध लिखे जाने लगे है। गीतों में छन्द, लयबद्ध स्वर और क्रमबद्धता की जगह रैप सॉन्ग ने ले ली है, जिसमें कहीं भी कुछ भी लिखा जा रहा है,, लेकिन फिर भी आज की युवा पीढ़ी उसे पसंद कर रही है, क्योंकि उसमें उन्हें कुछ नया महसूस होता है। शास्त्रीय संगीत और पुराने गाने सुनने की जगह रॉक म्यूजिक का जमाना है। आज के साहित्य पर विदेशी साहित्य का भी प्रभाव है। विदेश में लिखे जाने वाली विधाएं जैसे हाइकु आदि का प्रयोग किया जाने लगा। इस प्रकार विदेशी खान-पान सैंडविच, बर्गर, पिज़्ज़ा खाने के साथ-साथ हमने विदेशी संस्कृति के पहनावे को भी अपना लिया है। यही साहित्य का ही परिणाम है जब हम टीवी, रेडियो, मोबाइल आदि पर विदेशी साहित्य को देखते सुनते या पढ़ते हैं,तो उसे अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करते हैं और अपना भी लिया है। यही साहित्य का प्रभाव है। साहित्य से मनुष्य का जीवन कहीं भी अछूता नहीं रहा है। इसलिए हमें साहित्य से जीवन में अच्छी बातों को सीखना चाहिए और उतारना चाहिए, ताकि हम जीवन में प्रगति कर सके। कम उम्र में हम समझ नहीं पाते की हमें आगे उन्नति करने के लिए, आत्मनिर्भर बनने के लिए, अपने पैरों पर खड़े रहने के लिए क्या करना चाहिए? लेकिन साहित्य हमें सही दिशा निर्देश देते हैंl लेकिन हमें उन्हें समझ कर उसे मार्ग पर चलने की आवश्यकता है। जो सही है और हमें अपनी मंजिल तक पहुंचा दे। इसलिए अच्छा साहित्य चुने, अच्छा साहित्य देखें, पढ़े, सुने और समझे और उसे अपने जीवन में उतारे।
— शीला बड़ोदिया
शिक्षक, कवि, लेखक, गीतकार, समीक्षक
इंदौर (म.प्र.)


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