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Monday, September 28, 2026

मेरे तो गिरधर गोपाल: मीराबाई के काव्य में 'भक्ति, चेतना और स्त्री-स्वर' पर केंद्रित इंदौर लेखिका संघ का अभिनव आयोजन


नित्य संदेश, इंदौर। इंदौर की अग्रणी साहित्यिक संस्था 'इंदौर लेखिका संघ' द्वारा 'मेरे तो गिरधर गोपाल – मीरा बाई के काव्य में 'भक्ति, चेतना और स्त्री-स्वर' विषय पर अभिनव आयोजन हुआ। वरिष्ठ लेखिका श्रीमती शोभा दुबे के मुख्य आतिथ्य तथा इंदौर लेखिका संघ की संस्थापक अध्यक्ष व सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. स्वाति तिवारी की अध्यक्षता में अभिनव कला समाज के सभागार में संपन्न इस आयोजन में संघ की सदस्यों ने उत्साह से भाग लिया।


इस अवसर पर सुप्रसिद्ध चित्रकार व लेखिका श्रीमती वंदिता श्रीवास्तव सारस्वत अतिथि एवं कलाकार श्रीमती अंजू घिया विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं।


कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि शोभा दुबे ने कहा कि मीरा के भजन हमें संगीत और प्रार्थना के माध्यम से ईश्वर के प्रति प्रेम व्यक्त करने की शक्ति का स्मरण कराते हैं। उनकी कहानी हमें सांसारिक मोह-माया को त्यागकर ईश्वर में शाश्वत आनंद प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है। साथ ही उन्होंने इंदौर लेखिका संघ के शुरुआती दौर को याद करते हुए कहा कि मीरा बाई के साहित्य में स्त्री-स्वर जैसे विषय पर इंदौर लेखिका संघ जैसी स्थापित संस्था का यह अनूठा आयोजन हमें बताता है कि मीरा का काव्य केवल व्यक्तिगत पीड़ा का गान नहीं है, बल्कि वह तत्कालीन सामंती और पुरुष-सत्तात्मक व्यवस्था के विरुद्ध एक शांत परंतु दृढ़ विद्रोह भी है। मीरा की भक्ति में किसी अन्य के लिए स्थान नहीं है। वे स्पष्ट कहती हैं:

"मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।"

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. स्वाति तिवारी ने कहा कि मीरा का जीवन सिखाता है कि कभी-कभी अपने सत्य के लिए अकेले खड़ा होना पड़ता है। उन्होंने रूढ़ियों और अपेक्षाओं के बीच अपना भक्ति-पथ चुना, लेकिन उनकी स्वतंत्रता घृणा या विद्रोह से नहीं, प्रेम की अग्नि से निकली। उन्होंने किसी को नीचा नहीं दिखाया; उन्होंने बस अपने भीतर की पुकार सुनी। मीरा बाई का काव्य केवल मंदिरों में गाए जाने वाले भजनों का संग्रह नहीं है। यह एक स्त्री की स्वायत्तता के साथ, मध्यकालीन पितृसत्ता और सामाजिक बंदिशों को नकारते हुए स्त्री-स्वाभिमान एवं आत्म-निर्णय का एक निर्भीक स्वर है। उन्होंने कृष्ण-भक्ति को अपना संबल बनाकर न केवल तत्कालीन सामाजिक चेतना को झकझोरा, बल्कि स्त्री की स्वतंत्र आत्म-अभिव्यक्ति की नई राह प्रशस्त की। मीरा का स्वर सदियों से उन सभी स्त्रियों को साहस देता आ रहा है, जो अपनी पहचान और अपनी आवाज़ के लिए संघर्षरत हैं।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सारस्वत अतिथि वंदिता श्रीवास्तव ने कहा कि मीराबाई मध्यकालीन भक्ति आंदोलन की एक ऐसी अनूठी कवयित्री हैं, जिनके काव्य में ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम, सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ चेतना और मध्यकालीन भारतीय समाज में स्त्री-मुक्ति की सशक्त अभिव्यक्ति एक साथ दिखाई देती है। मीरा का काव्य केवल व्यक्तिगत पीड़ा का गान नहीं है, बल्कि वह तत्कालीन सामंती और पुरुष-सत्तात्मक व्यवस्था के विरुद्ध एक शांत परंतु दृढ़ विद्रोह भी है। आज मीरा को केवल मंजीरा लिए कृष्ण-भक्ति में डूबी स्त्री के रूप में नहीं, बल्कि उस चेतना के रूप में याद करना चाहिए जो कहती है कि यदि विश्वास अटूट है तो कठिनाईयाँ छोटी हो जाती हैं। इसके पश्चात उन्होंने मीरा बाई पर स्वरचित गीत सस्वर गाया।


कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अंजू घिया ने कहा कि मीरा की भक्ति केवल स्त्रियों की कथा नहीं, बल्कि हर मनुष्य की आत्मिक यात्रा है। ईश्वर तक पहुँचने के लिए चाहिए— सच्चा प्रेम, निर्मल हृदय, अटूट विश्वास और पूर्ण समर्पण।


कार्यक्रम तीन मिले-जुले सत्रों में बेहद रोचक साहित्यिक प्रस्तुतियों के साथ संपन्न हुआ। वैचारिक सत्र 'मीरा का काव्य: मध्यकालीन पितृसत्ता को चुनौती और स्त्री-चेतना' विषय पर केंद्रित रहा। इस सत्र का बीज वक्तव्य देते हुए डॉ. अनिता नाइक ने कहा कि मीरा का काव्य केवल भक्ति और विरह नहीं, बल्कि स्त्री के स्वाभिमान, स्वतंत्र चेतना और अपने निर्णय स्वयं लेने के साहस की सशक्त अभिव्यक्ति है; यही उनकी स्त्री-चेतना को आज भी प्रासंगिक बनाता है। डॉ. रश्मि जोशी ने माँ मीरा को योगदर्शन का साक्षात् स्वरूप बताते हुए कहा कि मीरा का जीवन प्रेम से भक्ति, भक्ति से समर्पण और समर्पण से परमयोग तक की ऐसी योगमय यात्रा है, जिसमें कर्मयोग, ज्ञानयोग और ध्यानयोग के विविध आयाम सहज रूप से अभिव्यक्त होते हैं। डॉ. प्रतीक्षा शर्मा ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मीरां बाई का काव्य केवल अनन्य कृष्ण-भक्ति का मार्ग ही नहीं दर्शाता, बल्कि वह मध्यकालीन बंदिशों एवं पितृसत्तात्मक ढाँचे के विरुद्ध स्त्री-स्वाभिमान और चेतना का सशक्त स्वर भी है।


काव्य-गीत संध्या के दौरान संघ की रचनाकारों ने मीरा बाई के भक्ति, भाव और चेतना से ओत-प्रोत पदों एवं मीरां से प्रेरित स्वरचित कविताओं का प्रभावी पाठ किया। इसमें डॉ. ज्योति सिंह, डॉ. सुरेखा भारती, रानू टुवानी, शीला बड़ोदिया, प्राची शर्मा पांडे, अरुण सराफ, सुरभि शुक्ला, कृष्णा जोशी, भारती दुबे, कविता चौहान, स्मृति तिवारी, शीला चंदन तथा मनोरमा जोशी ने "हेरी मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दर्द न जाणै कोय", "मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई", "पायो जी मैंने राम रतन धन पायो" तथा "हरि बिन कूँण गति मेरी" गाकर आयोजन को संगीतमय सरसता प्रदान की। सपना उपाध्याय की माउथ ऑर्गन पर सुंदर धुन सुनाई गई।


कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण मीरा बाई के जीवन एवं पदों पर आधारित भावपूर्ण नृत्य-नाटिका और मंचन रहा। मीराबाई की समर्पण एवं प्रेम यात्रा पर केंद्रित कृष्ण प्रेम चुनने की यात्रा के तहत सात वर्षीय नन्ही कलाकार एरिषा भद्रे ने 'वो कृष्णा है' पर सुंदर नृत्य किया। "मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई" पर डॉ. ज्योति सिंह, "पग घूँघरू बाँध मीरा नाची रे" पर कल्याणी गुप्ता तथा "एक राधा एक मीरा" पर डॉ. निशि मंजवानी के सुंदर नृत्य एवं अभिनय की प्रस्तुतियों ने सबका मन मोह लिया। विष-अमृत की परीक्षा के अंतर्गत राणा द्वारा भेजे गए विष के प्याले, सर्प की पिटारी जैसी कठिन परीक्षाओं और मीरा की अटूट आस्था का दृश्यांकन "राणा जी विष को प्यालो भेज्यो, पीवत मीरा हाँसी रे" तथा "माई री म्हें तो लीणो गोविन्दो मोल" पदों पर किया गया। विरह और प्रतीक्षा में मीरा की आत्मा की तड़प, प्रकृति के माध्यम से कृष्ण का संदेश और अनन्य प्रेम का भावुक मंचन अंजलि योगेश मिश्रा द्वारा किया गया।


आयोजन में विशेष रूप से कृष्ण और प्रकृति पर एकल प्रस्तुति दी गई। कृष्ण का बचपन और उनकी लीलाएँ महलों में नहीं, बल्कि वृंदावन के जंगलों, गोवर्धन पर्वत और यमुना के तटों पर बीतीं। उन्होंने कहा था कि हम वनवासी हैं और हमेशा वनों व पहाड़ियों के बीच ही रहेंगे। जब श्रीकृष्ण बांसुरी बजाते थे, तो उसकी मोहक तान से मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी, नदियाँ और पेड़-पौधे तक मुग्ध हो जाते थे। आज मनुष्य ने उस हरी-भरी प्रकृति को जिस तरह नष्ट किया है, उस पर प्रकृति की करुण पुकार को वरिष्ठ लेखिका सुषमा शुक्ला ने अपने जीवंत अभिनय से प्रस्तुत कर सभी को पर्यावरण का संदेश दिया।


कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन डॉ. सुरेखा भारती द्वारा प्रस्तुत मंगलाचरण तथा मुख्य अतिथियों व अध्यक्षा द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। तत्पश्चात मीरा बाई के पदों का सुगम गायन प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. सुरेखा भारती ने किया तथा आभार संस्था की महासचिव शीला बड़ोदिया ने व्यक्त किया।

अपने तरह के इस अनूठे आयोजन में उषा मंडलोई, निर्मला मुंदड़ा, हेमलता, आरती तिवारी सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी  और संस्था के सदस्य उपस्थित थे।

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