नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। शास्त्रीनगर स्थित निज निवास पर चल रही सामवेद की नवमी कथा का आज सप्तम और अंतिम दिवस धूमधाम से सम्पन्न हुआ। कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल ने प्रो. सुधाकराचार्य त्रिपाठी जी की प्रेरणा से सामवेद के नवम प्रपाठक के प्रथमार्धक की कथा का वाचन किया। कथा का शुभारंभ प्रो. लखनपाल ने सामूहिक पाठ से किया।
अञ्जते, व्यञ्जते, समञ्जते क्रतुं रिहन्ति मध्वाभ्यञ्जते।
आज की कथा का मुख्य विषय दिनचर्या रहा। आज की कथा के देवता सोम, इन्द्र, अग्नि, मरुत् और सूर्य रहे। कथा में बताया गया कि 12 आदित्यों का एक चक्र पूर्ण होने के साथ उषाकाल के आगमन पर पुनः दिनचर्या का क्रम प्रारम्भ होता है। कथाव्यास ने बताया कि यज्ञ की तैयारी में सोम का निर्माण किया जाता है, वह वेगपूर्वक कलश में अवतरित होता है, जो पुनर्जन्म की प्रक्रिया का संकेत है। इसके बाद यज्ञकर्ता इन्द्र के आह्वान हेतु मंत्रपाठ करते हैं। जिस प्रकार कल्याण की अभिलाषा में लोग सज्जन पुरुष के पास जाते हैं, उसी प्रकार कृपा पाने के लिए स्तुतियाँ इन्द्र की ओर जाती हैं। जिस प्रकार राजमार्ग से अनेक मार्ग निकलते हैं, उसी प्रकार इन्द्र से अनेक दान प्राप्त होते हैं। इन्द्र एक ओर वृत्रहन्ता हैं तो दूसरी ओर शतक्रतु हैं, वही हमारे त्राता, माता-पिता और भाई-बंधु हैं।
उन्होंने बताया कि सूर्य मित्र, अर्यमा और वरुण के रूप में तीनों लोकों में विद्यमान रहते हैं। वे ही गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि तथा दावाग्नि, वडवाग्नि और जठराग्नि के रूप में हमारे मध्य रहते हैं और हमारी दिनचर्या के महत्वपूर्ण आधार हैं। आज की कथा में पुनर्जन्म के प्रसंगों तथा दिनचर्या के विविध क्रियाकलापों का लौकिक और व्यावहारिक उदाहरणों द्वारा विस्तार से वर्णन किया गया।
इस अवसर पर निम्न मंत्रों का सस्वर पाठ किया गया -
सप्तिं मृजन्ति वेधसो गृणन्तः कारवो गिरा।
ज्योतिर्हि ज्ञानमुक्थ्यं नु पवमानम् ।। ३७।।
यस्य ते महिना महः परि ज्मायन्तमीयतुः।
हस्ता वज्रं हिरण्ययं शतक्रतो ।। ३८।।
कथा के समापन पर शांति पाठ किया गया।

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