नित्य संदेश। रक्षा बंधन केवल एक त्योहार नहीं, भारतीय समाज के पारिवारिक ताने-बाने का वह धागा है जो भावना, दायित्व और विश्वास को एक साथ पिरोता है। सावन की पूर्णिमा पर जब बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है, तो वह केवल एक रस्म नहीं निभाती, बल्कि दो दिलों के बीच एक अलिखित संविदा को दोहराती है - कि सुख-दुःख में हम एक-दूसरे के साथ खड़े रहेंगे।
परम्परा से परे एक सामाजिक अर्थ
पौराणिक कथाओं में द्रौपदी द्वारा कृष्ण को और इंद्राणी द्वारा इंद्र को रक्षा-सूत्र बांधने की कथाएं इस पर्व की जड़ें कितनी गहरी हैं, यह बताती हैं। इतिहास में रानी कर्णावती द्वारा हुमायूं को राखी भेजने की घटना ने इसे धर्म और रक्त के बंधन से ऊपर उठाकर मानवीयता के बंधन के रूप में स्थापित किया। मूल में इस पर्व का संदेश 'रक्षा' है। कभी इसका अर्थ बाहरी आक्रमण से रक्षा था, आज इसका अर्थ कहीं अधिक व्यापक हो गया है। आज रक्षा का अर्थ है - बहन की शिक्षा के अधिकार की रक्षा, उसके सपनों की रक्षा, उसकी पसंद और असहमति की रक्षा।
बदलते समय में बदलता बंधन
यह सुखद है कि रक्षा बंधन का स्वरूप अब केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं रहा। पहला बदलाव तो यह है कि अब बहनें भी बहनों को, भाई भी भाई को, और कई जगह बेटियां अपने पिता को भी राखी बांध रही हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि रक्षा अब किसी लिंग विशेष का एकाधिकार नहीं रही। जो सक्षम है, वह रक्षा करेगा - चाहे वह भाई हो या बहन। दूसरा बदलाव, जो सोचने पर मजबूर करता है, वह है इस त्योहार का बढ़ता बाज़ारीकरण। 500 रुपये की राखी और हजारों के गिफ्ट के शोर में कहीं वह आत्मीयता तो नहीं खो रही जो इस त्योहार की आत्मा थी? संपादकीय का यह मानना है कि प्रेम की कीमत उपहार से नहीं, उपस्थिति से तय होती है।
इस रक्षा बंधन पर एक संकल्प
आज जब बहनें घर की चारदीवारी से निकलकर खेत, फैक्ट्री, प्रयोगशाला और अंतरिक्ष तक अपनी पहचान बना रही हैं, तो भाई का सबसे बड़ा उपहार उसकी राह में आने वाली बाधाओं के खिलाफ खड़ा होना होगा। दहेज, घरेलू हिंसा और कार्यस्थल पर असमानता जैसी कुरीतियों से उसकी रक्षा करना ही सच्चे अर्थों में राखी के वचन को निभाना है।
खून से नहीं, संवेदना से बनते हैं रिश्ते
राखी का वह कच्चा धागा कच्चा नहीं, बहुत पक्का होता है। वह याद दिलाता है कि हमारे रिश्ते खून से नहीं, संवेदना से बनते हैं। इस रक्षा बंधन पर हम केवल कलाई पर धागा न बांधें, बल्कि मन में यह संकल्प भी बांधें कि हम एक-दूसरे की गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करेंगे।
यही इस पर्व की सार्थकता है, और यही इसकी सुंदरता भी।
लियाकत मंसूरी
संपादक
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