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Saturday, August 8, 2026

'महामाता' : जीवन, मृत्यु और मातृत्व के अंतर्द्वंद्व की मार्मिक प्रस्तुति

नवीन मौर्य

नित्य संदेश, इंदौर। 21 वीं सानंद नाट्य स्पर्धा में मंगलवार को वेल एन वेल सोसायटी ने मराठी नाटक महामाता  का अविस्मरणीय मंचन किया। युवा उद्योगचक  गौरव तराणेकर एवं उनकी सुविधा पत्नी सौ. अनिका तराणेकर ने दीप प्रज्वलित  कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया । अतिथि स्वागत किया जयंत भिसे, संजीव वावीकर, अनिरुद्ध नागपुरकर ने । औपचारिक कार्यक्रम का सूत्रसंचालन किया सानंद मित्र कुमारी जान्हवी  मुद्रिस एवं कुमारी ध्रुव भट्ट ने ।


दरअसल, कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन पर चर्चा करना जितना कठिन होता है, उन्हें रंगमंच पर संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करना उससे कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। इच्छामृत्यु ऐसा ही एक विषय है, जो आज विश्वभर में नैतिक, मानवीय और चिकित्सकीय बहस का केंद्र बना हुआ है। बढ़ती आयु, असाध्य रोग, दुर्घटनाओं से उत्पन्न स्थायी विकलांगता और असहनीय शारीरिक पीड़ा,इन परिस्थितियों में जीवन और मृत्यु के बीच खड़े मनुष्य की दुविधा को नाटक 'महामाता' अत्यंत मार्मिकता और गहन संवेदना के साथ अभिव्यक्त करता है।


प्रख्यात साहित्यकार वाचस्पती गो.  बनहट्टी ने इस नाटक के माध्यम से केवल इच्छामृत्यु का प्रश्न नहीं उठाया, बल्कि मातृत्व, करुणा, त्याग और मानवीय विवशता की उन परतों को भी उद्घाटित किया है, जहां कोई निर्णय सही या गलत नहीं रह जाता, बल्कि केवल पीड़ा शेष रह जाती है। उनका लेखन कहीं भी उपदेशात्मक नहीं बनता, बल्कि दर्शकों को आत्ममंथन के लिए विवश करता है। यही उनकी लेखकीय शक्ति है।


नाटक का केंद्र है सेना का अधिकारी अविनाश, जो एक वायु दुर्घटना के बाद स्थायी रूप से विकलांग हो जाता है। अपने उज्ज्वल भविष्य को अंधकार में डूबता देखकर वह स्वयं को "जीवित लाश" के रूप में देखने लगता है। जीवन उसके लिए संघर्ष नहीं, बल्कि असहनीय यातना बन जाता है। अंततः वह इच्छामृत्यु का निर्णय लेता है और इस निर्णय को पूरा करने के लिए अपनी जन्मदात्री मां से सहायता मांगता है। यहीं से नाटक अपने सबसे मार्मिक और हृदयविदारक मोड़ पर पहुंचता है। एक मां, जिसने बेटे को जन्म दिया, वही उसे मृत्यु की ओर विदा करने की असहनीय पीड़ा अपने भीतर समेटती है। यह दृश्य दर्शकों के मन को भीतर तक झकझोर देता है।


दिग्दर्शक श्रीकांत भोगले ने इस अत्यंत संवेदनशील विषय को उल्लेखनीय परिपक्वता और कलात्मक संयम के साथ मंच पर साकार किया है। उन्होंने अनावश्यक नाटकीयता या भावनात्मक अतिशयोक्ति से बचते हुए पात्रों की आंतरिक पीड़ा को सहज और प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है। उनके निर्देशन में प्रत्येक दृश्य कथा को आगे बढ़ाने के साथ-साथ दर्शकों के मन में गहरे प्रश्न भी छोड़ जाता है।

'महामाता' केवल एक पारिवारिक कथा नहीं है, बल्कि यह जीवन के अधिकार, मृत्यु की गरिमा, चिकित्सा नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करने वाला नाटक है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह किसी निष्कर्ष को थोपता नहीं, बल्कि दर्शकों को स्वयं विचार करने का अवसर देता है।


समग्र रूप से 'महामाता' एक ऐसी रंगकृति है, जो अपनी संवेदनशील विषयवस्तु, वाचस्पती गो. श्री. बनहट्टी के विचारोत्तेजक लेखन और श्रीकांत भोगले के सधे हुए निर्देशन के कारण लंबे समय तक स्मृति में बनी रहती है। यह नाटक केवल देखा नहीं जाता, बल्कि महसूस किया जाता हैऔर यही किसी श्रेष्ठ रंगकृति की सबसे बड़ी पहचान है। इंदौर के वरिष्ठ रंगकर्मी 

श्रीकांत भोगले जितने अच्छे दिग्दर्शक हैं। उतने ही बेहतरीन अभिनेता भी हैं। उन्होंने इस नाटक में अभिनय भी किया है। अन्य सभी कलाकारों ने भी प्रभावी अभिनय किया। 


प्रकाश योजना, ध्वनि संकलन और नेपथ्य योजना की भी प्रशंसा हुई। कुल मिलाकर नाटक प्रभावी साबित हुआ।


कलाकार 

सुधांशु खरे, आशुतोष काणे, पराग जौहरी, श्रीकांत भोगले, सौ. रेखा देशपांडे, सौ. तन्वी भाटवडेकर 


क्रू टीम

लेखक : वाचस्पती गो.श्री. बनहट्टी

दिग्दर्शक : श्रीकांत भोगले

ध्वनि संकलन : सौ. रेणुका अर्वीकर

रंगभूषा योजना : सौ. अनुराधा चौधरी

वेषभूषा योजना : सौ. नीतू कवठेकर

नेपथ्य योजना : सौ. कीर्ति जोशी

प्रकाश योजना : संदीप गोखले

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