Tuesday, July 28, 2026

विरोध —डॉ. शबनम सुल्ताना की कविता


नित्य संदेश

विरोध

इस कदर मुखालिफत से क्या पाओगे।

क्या तुम अपने जमीर से नज़र मिला पाओगे।

चलों थी तुम्हें मुझसे लाख शिकायतें।

मेरा विरोध अब हर गली चौराहे में होता देख तुम सुकू की नींद सो पाओगे।

जो बातें चारदीवारी के अंदर थी।

उन्हें बाहर ला कर मेरे साथ साथ रुसवा तो तुम भी हो जाओगे।

सिर जो झुका मेरा तो क्या तुम अपनी इज्जत के जनाजे को कांधा खुद दे पाओगे।

मेरे हमदम मेरे हमसफ़र कभी जो सोचोगे अपनी हर महकती हुई याद में मुझे ही पाओगे।

न हुआ न होगा तुमसे मेरा मुकाबला।

क्या कभी अपनी ही रुह से जुदा हो पाओगे।



—डॉ. शबनम सुल्ताना

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