Tuesday, July 28, 2026

गुरु गरिमा— जीवनप्रकाश आर्य की गुरु को समर्पित कविता

नित्य संदेश 

गुरु गरिमा

ज्ञान छलकता हो आनन से,

जो सिरजन में ब्रह्म समान।

जो व्यापक पोषण करते हों,

जग हित में करते विषपान।

ऐसे त्यागी तपोमूर्ति ही,

पाते हैं गुरु पद सम्मान।

कर्म, आचरण से, वाणी से,

जो विद्याधन देते आए।

अंतर्मन के गहन तिमिर में,

ज्ञान-रश्मियां जो प्रकटाए।

उन गुरुवर के चरण-कमल में,

झुकता है नभ का दिनमान।

पाते हैं गुरु पद सम्मान। (1)

जो समाज के निर्णायक हों,

वेद ऋचाओं के गायक हों।

अंधे, अज्ञानी शिष्यों के,

प्रगति-पंथ पर उन्नायक हों।

जिनकी श्वास-श्वास देती हो,

जन-जन को वैभव-वरदान।

पाते हैं गुरु पद सम्मान। (2)

तपोनिरत हो जिनका जीवन,

सह न सकें जो कातर क्रंदन।

किसी व्यथित की पीर मिटाने,

दौड़ करें जो औषधि-लेपन।

अन्यों के आंसू पीकर जो,

क्रंदन को कर दें मुस्कान।

पाते हैं गुरु पद सम्मान। (3)

जो शिष्यों को धर्म सिखाते,

अर्थार्जन के तंत्र दिखाते।

धर्मोचित कामना पूर्ति के,

प्रखर प्रभावी मंत्र बताते।

मृगतृष्णा के महालोक में,

मुक्ति-मार्ग का दें संधान।

पाते हैं गुरु पद सम्मान। (5)

जनक-जननी काया देते हैं,

परिजन से मिलती पहचान।

किन्तु शिष्य की आत्मा पर तो,

गुरु ही करता है अवधान।

जीव ब्रह्ममय ही हो जाता,

जब मिलता गुरु का वरदान।

पाते हैं गुरु पद सम्मान। (6)


​इस ऋण को, ऋण कैसे मानें?

यह तो है शिक्षा की भिक्षा!

तन-मन-जीवन सब बंधक हैं,

जब से प्राप्त हुई गुरु-दीक्षा।

गुरु के पूर्ण बिम्ब बन जाएं,

तब होगा आंशिक भुगतान।

पाते हैं गुरु पद सम्मान। (7)

​संसार के समस्त गुरुओं के श्री चरणों में, एक कृतज्ञ शिष्य का शाब्दिक भावार्चन।



​—मैं कृतज्ञ शिष्य जीवन

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