Friday, July 24, 2026

पैसा मर्द होता है...— रविंद्र तंवर 'सूर्योदय'

नित्य संदेश 

पैसा मर्द होता है

सोता नहीं रात भर,

अकेले में रोता है।

किसे बताए दर्द अपना,

कहां उसका कोई होता है।।


आदमी मर्द नहीं होता,

पैसा मर्द होता है...


तानों से भरा होता है जीवन,

बोझ फिर भी वह ढोता है।

अपनों की ख्वाहिशें पूरी करने में,

मुस्कान अपनी वह खोता है।।


आदमी मर्द नहीं होता,

पैसा मर्द होता है...


बीवी - बच्चे, मां - बाप,

सब के मन को भाता है।

सब करते है इज्जत उसकी,

मर्द जब तक कमाता है।।

और अगर कुछ दिन घर बैठ जाए,

तो वो निकम्मा नकारा कहलाता है।


आदमी मर्द नहीं होता,

पैसा मर्द होता है...


एहमियत अचानक घट जाती है,

जब उमर कमाने की नहीं रह जाती।

जो कभी था मुखिया घर का,

अब वो हर दिन जिल्लत सहता है।


आदमी मर्द नहीं होता,

जनाब पैसा मर्द होता है...



रविंद्र तंवर 'सूर्योदय'

बड़वाह (म. प्र.)

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