Friday, July 24, 2026

1. बात मुस्कानों की... 2. ठिठुरते रिश्तों को संवारा जाए... —अरूण कैलाश चतुर्वेदी की दो कविताएं

1. बात मुस्कानों की

नित्य संदेश

आँखों में नए ख़्वाब होने चाहिए,

ज़िंदगी नए रंगों से रँगनी चाहिए।

अश्कों पे लिख दी हमने किताब,

बात अब मुस्कानों की होनी चाहिए।।


​ज़िंदगी ख़्वाबों सी हसीन होनी चाहिए,

बात बस अब मुस्कानों की होनी चाहिए।

भूल जा वो ख़ूबसूरत मोड़ जो छोड़ आया है,

बात हो तो नए रास्तों की होनी चाहिए।।

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2. ठिठुरते रिश्तों को संवारा जाए

सर्दी बढ़ी है, फिर कुछ जलाया जाए

ठिठुरते रिश्तों को फिर से सँवारा जाए


​टूट गई माला, बिखरे से हैं सब मोती

किसी को अब किसी की चाहत नहीं होती

मिल-बैठकर उलझनों को सुलझाया जाए


​सर्दी बढ़ी है, फिर कुछ जलाया जाए

ठिठुरते रिश्तों को फिर से सँवारा जाए


​तू खफ़ा किसी बात पर, मैं किसी बात पर

तू अपनी राह में ख़ुश है, मैं अपनी राह पर

चल किसी मोड़ पर राहों को मिलाया जाए


​सर्दी बढ़ी है, फिर कुछ जलाया जाए

ठिठुरते रिश्तों को फिर से सँवारा जाए


​तन्हाइयाँ रोकेंगी तुझे, मुझे भी

कुछ ज़ख्म हरे हैं तेरे और मेरे भी

नफ़रतों को अलाव में मिलकर जलाया जाए


​सर्दी बढ़ी है, फिर कुछ जलाया जाए

ठिठुरते रिश्तों को फिर से सँवारा जाए।


— अरुण कैलाशनाथ चतुर्वेदी

भोपाल (म.प्र.)

(लेखक — व्यवसायी हैं)

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