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Thursday, June 18, 2026

फोर्ट विलियम कॉलेज से जो लाभ हुआ, वैसा ही लाभ हमें दिल्ली कॉलेज से भी मिला : डॉ. अख्तर तक़ी आबिदी


सीसीएस विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में “फोर्ट विलियम कॉलेज की साहित्यिक सेवाएँ” विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित

नित्य संदेश ब्यूरो 
मेरठ। फोर्ट विलियम कॉलेज से जॉन गिलक्राइस्ट सेवानिवृत्त होकर वर्ष 1815 में लंदन चले गए, जहाँ उन्होंने एक विद्यालय की स्थापना की और 1817 से अंग्रेजों को शिक्षा दी जाने लगी। हमने बहुत कुछ खोया भी और बहुत कुछ पाया भी। अंग्रेजों की दृष्टि मुस्लिम देशों पर थी। उर्दू और फ़ारसी एक भाषाई प्रक्रिया का हिस्सा हैं। बड़ी संख्या में पुस्तकों के अनुवाद हुए। फोर्ट विलियम कॉलेज से जो लाभ हुआ, वैसा ही लाभ हमें दिल्ली कॉलेज से भी मिला। ये विचार प्रसिद्ध शोधकर्ता एवं आलोचक डॉ. तक़ी आबिदी (कनाडा) ने उर्दू विभाग एवं आयुसा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “फोर्ट विलियम कॉलेज की साहित्यिक सेवाएँ” विषयक कार्यक्रम की अध्यक्षीय टिप्पणी में व्यक्त किए। 

उन्होंने कहा कि अंग्रेजों द्वारा बोए गए बीजों ने उर्दू भाषा को विकास का अवसर दिया और परिणामस्वरूप हमारी भाषा में नई-नई पारिभाषिक शब्दावली का समावेश हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ सईद अहमद द्वारा पवित्र कुरआन के पाठ से हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान डॉ. तक़ी आबिदी (कनाडा) ने की। विशिष्ट अतिथियों के रूप में प्रसिद्ध कथाकार एवं आलोचक प्रो. अज़ीमुल्लाह हाशमी (कोलकाता) तथा डॉ. वसी आज़म अंसारी (सहायक प्रोफेसर, केएमसीयू विश्वविद्यालय, लखनऊ) उपस्थित रहे। सम्मानित अतिथि के रूप में प्रसिद्ध कथाकार डॉ. सोफ़िया शीरीं (कोलकाता) कार्यक्रम में शामिल हुईं।

शोधपत्र प्रस्तुत करने वालों में डॉ. तालिब इकराम (इलाहाबाद), डॉ. शहनवाज़ आलम (कोलकाता), एम. ऐमन (शोधार्थी, केएमसीयू विश्वविद्यालय, लखनऊ) तथा अमरीन नाज़ खुर्जा (शोधार्थी, उर्दू विभाग, सीसीएस विश्वविद्यालय, मेरठ) शामिल थीं। कार्यक्रम में प्रो. सगीर अफराहीम और आयुसा की अध्यक्ष प्रो. रेशमा परवीन भी उपस्थित रहीं। स्वागत भाषण डॉ. इरशाद सियानवी ने तथा संचालन डॉ. शबनम शम्साद ने किया।

उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. असलम जमशेदपुरी ने विषय का परिचय देते हुए कहा कि फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना अंग्रेजों ने अपने प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए की थी, किंतु इस संस्थान ने उर्दू गद्य और कविता दोनों की विशेष सेवा की। मीर अमन देहलवी द्वारा “बाग़-ओ-बहार” के नाम से किया गया अनुवाद भाषा को सरल और जनसुलभ बनाने में अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ। हैदर बख्श हैदरी, मिर्ज़ा अली लुत्फ़, मीर काज़िम और निहालचंद लाहौरी आदि ने फ़ारसी, अरबी और अंग्रेज़ी की अनेक पुस्तकों का उर्दू में अनुवाद किया। इस कॉलेज की स्थापना बंगाल में हुई थी।

अपने शोधपत्र “उर्दू गद्य में फोर्ट विलियम कॉलेज की सेवाएँ” प्रस्तुत करते हुए डॉ. तालिब इकराम ने कहा कि जब कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हुई, तब ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारियों को स्थानीय कार्यों के निष्पादन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। इन्हीं आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर इस कॉलेज की स्थापना की गई।

एम. ऐमन ने अपने शोधपत्र “फोर्ट विलियम कॉलेज : एक युग-निर्माता संस्था” में कहा कि फोर्ट विलियम कॉलेज से पहले भी उर्दू कविता का महत्वपूर्ण स्थान था, किंतु इसके बाद गद्य और पद्य दोनों विधाओं में उल्लेखनीय विकास हुआ। अमरीन नाज़ ने “फोर्ट विलियम कॉलेज के साहित्यिक कारनामे” विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि इस संस्थान ने दास्तान साहित्य के साथ-साथ अनुवाद परंपरा को भी समृद्ध किया। भाषा के विकास में इसकी सेवाओं को भुलाया नहीं जा सकता।

कार्यक्रम में डॉ. सोफ़िया शीरीं ने कहा कि फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना कलकत्ता में हुई थी, लेकिन इसकी कक्षाएँ कॉलेज परिसर के बाहर संचालित होती थीं। प्रत्येक छात्र को तीन सौ रुपये और मीर बहादुर अली को दो सौ रुपये मानदेय दिया जाता था। इस कॉलेज से पहले वहाँ एक मदरसा था जहाँ फ़ारसी की शिक्षा दी जाती थी। डॉ. जॉन गिलक्राइस्ट को इस कॉलेज का प्रमुख बनाया गया। जब अंग्रेजों ने फ़ारसी सीखना प्रारंभ किया, तब फ़ारसी के अध्यापक नियुक्त किए गए। साथ ही, लेखन, संपादन और अनुवाद के क्षेत्र में इस कॉलेज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

डॉ. वसी अज़म अंसारी ने कहा कि सन् 1800 में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हुई। जब मीर अमन की “बाग़-ओ-बहार” लिखी गई तो उसकी अठारह बार संशोधन एवं संपादन किया गया। कुछ अंग्रेज विद्वानों ने भी पुस्तकें लिखीं। निहालचंद लाहौरी की पुस्तक “मकतब-ए-इश्क़” का अध्ययन करने पर उसका शैलीगत साम्य रजब अली बेग सुरूर की लेखन शैली से दिखाई देता है। फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना से उर्दू भाषा का व्यापक विकास हुआ।
प्रो. अज़ीमुल्लाह हाशमी ने कहा कि मीर अमन देहलवी ने “किस्सा-ए-चहार दरवेश” को “बाग़-ओ-बहार” के रूप में प्रस्तुत किया। 

रजब अली बेग सुरूर ने “फ़साना-ए-अजायब” की रचना की, किंतु “बाग़-ओ-बहार” को उर्दू साहित्य की अमूल्य धरोहर माना जाता है। चहार दरवेश के अतिरिक्त नैतिक कथाओं को भी सरल भाषा में लिखा गया। अनुवाद परंपरा, मुद्रण और प्रकाशन को बढ़ावा मिला तथा उर्दू को जनभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि यदि फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना न हुई होती तो उर्दू गद्य को वह प्रतिष्ठा प्राप्त न होती जो आज उसे हासिल है।

प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. सगीर अफराहीम ने कहा कि मुगलों के आगमन से पहले यहाँ फ़ारसी भाषा का प्रभुत्व था। फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना से हमें उत्कृष्ट उर्दू गद्य प्राप्त हुआ। हैदर बख्श हैदरी, मीर अमन और निहालचंद लाहौरी जैसी हस्तियों की सेवाओं को कभी भुलाया नहीं जा सकता। इस अवसर पर डॉ. आसिफ अली, मोहम्मद शम्साद, अतहर ख़ान सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।

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