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Thursday, June 18, 2026

क्यों अजनबी हैं हम — निखिल पांडे, शिक्षाविद् की एक कविता

 

नित्य संदेश

क्यों अजनबी हैं हम

​ये उदासी और थकान,

मानव दिलों के टूटते अरमान।

चकाचौंध में डूबा यह शहर,

अपने ही बसेरे में,

सब हो गए अनजान।

​ये कैसी उड़ान,

टूटती मासूमियत,

भटकता बदहवास नौजवान,

खामोश, बेजान रिश्तों में -

कैसा इंसान!

​मिशनपरस्ती और रोजगार,

आधुनिकता की डिमांड,

उपभोक्ता की धड़कन -

ये है पश्चिमी विचार।

​अपने ही शहर में नहीं है

अपनी पहचान,

हर शख्स में न जाने क्यों

भर गया है अभिमान।

​क्यों हो गए पराए

अपने ही चमन में?

क्यों अजनबी हैं,

हम अपने ही शहर में?

​वर्षों से मेरे पड़ोस में,

एक आदमी रहता है

कौन है? यह मुझे

अब तक नहीं पता।

​नज़रें मिलती हैं,

हैलो तो हुई है,

पर अजनबीपन

वैसा ही बना है।

​क्यों खो गए हम

हम अपनी ही डगर में?

क्यों अजनबी हैं हम

अपने ही शहर में?


— निखिल पांडे 

नई दिल्ली

(लेखक शिक्षाविद् हैं।)

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