नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। शहर की सभी इमाम बारगाहों में मजलिसों और मातम का सिलसिला अपने अंतिम चरण में पहुंच गया और आशूरा का दिन करीब आ गया। सभी अज़ा खानों में अलविदाई मजलिसें हुई। लाला बाजार स्थित इमामबारगाह छोटी कर्बला में " इमामत, ईलाही निज़ाम - ए - हयात " शीर्षक के तहत मजलिस को संबोधित करते हुए मौलाना सैयद अब्बास बाकरी ने कहा कि " आज की रात वह रात है जो इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके वफादार साथियों और समर्थकों ने कर्बला में इबादत में गुजारी थी। हमें भी इस रात को इबादत, गम और मातम में गुजारना चाहिए।
मौलाना ने आगे कहा कि इमाम हुसैन (अ.स.) की कुर्बानी हमें धैर्य, दृढ़ता और सच्चाई पर जमे रहने की शिक्षा देती है। इसलिए इमाम हुसैन और उनके साथियों की महान कुर्बानी को न केवल याद किया जाना चाहिए बल्कि हमें उनके बताए रास्ते पर अडिग होकर आगे बढ़ना चाहिए। आज इस शीर्षक की आखिरी मजलिस में मौलाना ने दुखों के बीच इमाम हुसैन (अ.स.) की आखिरी कुर्बानी, उनके 6 महीने के बेटे हजरत अली असगर की क्रूर शहादत और यजीद की सेना की बेरहमी को बयान करते हुए कहा" अली असगर वह शहीद हैं जिन की शहादत पर इंसान नही इंसानियत रोती है । मजलिस में अली असगर का झूला बरामद हुआ। अकीदतमंदों ने हजरत इमाम हुसैन (अ.स.) को उनके 6 माह के बच्चे की शहादत का पुरसा दिया। मजलिस में सोज ख्वानी जाहिद हुसैन ने की और पेशख्वानी अब्बास मुर्तजा और फखरी मेरठी ने की । अंजुमन ए इमामिया ने नोहा ख्वानी और मातम किया ।
नमाज ज़ौहरैन के बाद मौलाना मुज़फ़्फ़र हुसैन ज़ैदी ने अजा खाना शाह कर्बला वक्फ मंसबिया में अपने शीर्षक " इमामत और कुरान" के तहत मजलिस को संबोधित किया । मजलिस में मौलाना ने हजरत अब्बास (अ.स.) की बहादुरी और वफादारी का वर्णन किया। उन्होंने उनकी शहादत का मार्मिक दृश्य पेश किया और शोकाकुल लोगों को भावुक कर दिया। मजलिस के बाद हजरत अब्बास के अलम की शबीह बरामद हुई । बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने शिरकत की और नम आंखों से हजरत फातिमा को हजरत अब्बास का पुरसा दिया । मजलिस में सोज ख्वानी दानिश आबिदी और सरोश अब्बास ने की ।
शहर की अन्य इमामबारगाहों में भी निर्धारित समय पर मजलिस और मातम का सिलसिला जारी रहा। मुहर्रम कमेटी की मीडिया प्रभारी डॉ. इफ्फत जकिया ने बताया, "मगरिब की नमाज के बाद सभी इमामबारगाहें आशूरा की रात के लिए खोल दी गईं। हजरत इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत की रात सोगवारों ने जागकर, इमाम हुसैन (अ.स.) की याद में रोते-बिलखते और मातम करते हुए अज़ाखानों में जाग कर गुजारी।"

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