नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। कथाव्यास प्रो. सुधाकराचार्य त्रिपाठी ने मयूर विहार में अपने आवास पर सामवेद की षष्ठकथा में सामवेद में वर्णित मृत्यु के बाद पुनर्जन्म की प्रक्रिया को समझाया।
पाँचवें दिन की विस्तृत कथा हुई। त्रिपाठी जी ने बताया कि वेदवाणी सृष्टि से पूर्व की है। वेद ईश्वर की वाणी है जो सभी जलचर,थलचर और नभचर, मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, नदी,पर्वत, वनस्पति के लिए है। उन्होंने जमदग्नि ऋषि के प्रसंग में काल निर्धारण की प्रक्रिया को समझाया। उपमन्यु और वशिष्ठ के आख्यान को सुनाया।
ऋषिगण सोम की विचित्र रक्षाप्रणाली के लिए प्रार्थना करते हैं। आकाश से वाणी रक्षाप्रणाली के रूप में पैदा हुई। त्रिपाठी जी ने सृष्टि के प्रारम्भिक काल से लेकर वर्तमान काल की रक्षाप्रणाली का वर्णन किया।
उन्होंने तुभ्यं और तुभ्येम के ऋषिकवि द्वारा प्रयुक्त यमक प्रयोग के सौन्दर्य को स्पष्ट किया। वृषा शब्द के पाँच बार प्रयोग को समझाया।
ऋषि सोम से प्रार्थना करते हैं कि मेघ बन कर हमें दान दीजिए। मृत्यु के बाद सोम बन कर आओ, पर्जन्य बन कर बरसो, अन्न बनो, उससे शुक्र और अण्ड बनकर गर्भ, शिशु बनो। इस प्रकार सामवेद मृत्यु के बाद नई सृष्टि की विद्या है।

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