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| तीन दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श 'प्रणाम उदन्त मार्तण्ड' का समाहार, तीन दिन में देशभर के 60 से अधिक पत्रकारों ने विभिन्न विषयों पर किया विमर्श |
नित्य संदेश ब्यूरो
भोपाल। भारत भवन में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय और वीर भारत न्यास की संयुक्त पहल पर आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संविमर्श 'प्रणाम उदन्त मार्तण्ड' में 'स्वाभिमानी भारत' विषय पर प्रख्यात फ़िल्म निर्माता एवं अभिनेता डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने मनुष्य और देवता को परिभाषित करते हुए कहा कि जो सोचता है, वह मनुष्य है। जो देता है, वह देवता है। उन्होंने उपनिषद की कथा 'द द द' सुनकर इस विषय को विस्तार दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य दान देता है। देवता अपनी इच्छाओं का दमन करते हैं। दानवों से कहा गया है कि प्राणियों पर दया करो। दूसरों का धन, सुख, चैन छीनों मत।
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| भारतीय वांग्मय में हैं सुशासन के सूत्र : डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी |
उन्होंने कहा कि हमारी जितनी भी व्यवस्थाएं हैं, वे मनुष्य को मांगने वाला बनाती हैं। इस दृष्टिकोण को बदलने की आवश्यकता है। उन्होंने बाणभट्ट की पुस्तक 'हर्ष चरित्र' पढ़ना चाहिए, जिसमें लोक सेवक का सटीक वर्णन किया गया है।
भारतीय वांग्मय में सुशासन को लेकर क्या उल्लेख आया है, इसका जिक्र करते हुए श्री द्विवेदी ने कहा कि रामायण में श्रीराम ने भरत से 88 प्रश्न किए हैं, जो सुशासन के प्रश्न हैं। उसमें एक प्रश्न यह भी है कि भरत तुम्हारे राज्य में रिश्वत लेकर अपराधी को छोड़ तो नहीं दिया जाता? क्या आपके राज्य में किसान केवल वर्षा के पानी पर निर्भर तो नहीं? महाभारत में भी इस प्रकार के प्रश्न ऋषि पूछते दिखाई देते हैं। देवर्षि नारद ने महाराज युधिष्ठर ने ऐसे कई प्रश्न पूछे जो सुशासन के प्रश्न हैं।
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| शब्दों के जन्म के पीछे है अनुभव और संस्कृति : श्री हितेश शंकर |
इसी सत्र में वरिष्ठ पत्रकार श्री हितेश शंकर ने शब्दों के निर्माण और उनके पीछे की संस्कृति को समझाते हुए कहा कि अनुभव नहीं है तो आविष्कार नहीं है, आविष्कार नहीं है तो शब्द नहीं है। रूस में पंखे के लिए कोई शब्द नहीं है क्योंकि वहां गर्मी नहीं है। इसी प्रकार अंग्रेजी में घी के लिए कोई शब्द नहीं है। उन्होंने कहा कि पश्चिम अध्ययन करते समय भारत की दृष्टि रखना चाहिए। हमारे समाज की जो परंपराएं हैं, वो हमें कुछ सिखाती हैं।
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| अब कोलकाता जाकर उदन्त मार्तण्ड को करेंगे प्रणाम : कुलगुरु श्री विजय मनोहर तिवारी |
कार्यक्रम के समापन सत्र में कुलगुरु श्री विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि भारत भवन में तीन दिन से चल रहे राष्ट्रीय संविमर्श 'प्रणाम उदन्त मार्तण्ड' का आज समापन नहीं है, बल्कि एक विराम है। अब हम उदन्त मार्तण्ड को प्रणाम करने के लिए इस कार्यक्रम को लेकर उसके जन्म की भूमि पश्चिम बंगाल (कोलकाता) जाएंगे। इसके बाद बनारस, लखनऊ सहित उन सभी स्थानों पर जाकर यह समारोह करेंगे, जहां से निकले समाचार पत्रों ने स्वतंत्रता के संघर्ष में योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम 250 विद्यार्थियों के लिए कार्यशाला भी रहा है। विद्यार्थियों ने इस आयोजन में समाचार पत्र निकाला, न्यूज़ बुलेटिन निकाले और पॉडकास्ट किए। यहाँ तीन दिन हुए विमर्श से प्राप्त सामग्री पर अब हमारे विद्यार्थी तीन महीने काम करेंगे।
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| संवेदना के स्तर पर एक हैं हमारी भाषाएं : डॉ. कृपाशंकर चौबे |
'प्रणाम उदन्त मार्तण्ड' में 'भारतीय भाषाओं का राष्ट्रीय स्वर' पर परिचर्चा का आयोजन हुआ, जिसमें वरिष्ठ श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी, सुश्री जयंती रंगनाथन, डॉ. कृपाशंकर चौबे और श्री शैलेश पांडेय ने अपने विचार रखे। सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार श्री अनिल पांडेय ने किया।
डॉ. कृपाशंकर चौबे ने कहा कि भारत की भाषाओं के बीच सेतु बंधन है। हमारी सभी भाषाएं संवेदना के स्तर पर एक हैं। उन्होंने अनेक उदाहरण देकर बताया कि अन्य भाषा के पत्रकारों ने किस तरह हिंदी को समृद्ध किया है। उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य एक है जो अलग-अलग भाषाओं में लिखा जाता है। यही बात पत्रकारिता पर लागू होती है। उन्होंने कहा कि स्वराज्य के लिए सभी भाषाओं की पत्रकारिता ने एक तरीके से काम किया। स्वतंत्र की लड़ाई में प्रत्येक भाषा की पत्रकारिता का संघर्ष शामिल है। डॉ. चौबे ने कहा कि भारतीय भाषाओं की संवेदना एक रही है। आपातकाल में भी यह संवेदना दिखाई देती है।
पत्रकारिता में हो असहमति का सौंदर्य : श्री शैलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार श्री शैलेश पांडेय ने कहा कि जिस समय उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन हुआ तब हमारा संघर्ष अंग्रेजों से था और आज का संघर्ष लोकतंत्र को जीवंत बनाये रखने का है। उन्होंने बताया कि हिंदी पत्रकारिता से 6 वर्ष छोटी मराठी पत्रकारिता है। श्री पांडेय ने बाल गंगाधर तिलक की पत्रकारिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि तिलक की पत्रकारिता असहमति की पत्रकारिता थी। बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने पत्रकारिता को नया स्वरूप देने का काम किया। उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से समाज सुधार को आगे बढ़ाया। श्री पांडेय ने कहा कि हमारी सभी भाषाओं की पत्रकारिता का स्वर राष्ट्रीयता का है। पत्रकारिता की प्राथमिकता हाशिये पर खड़ा व्यक्ति होना चाहिए। भारत की पत्रकारिता की चुनौतियों की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा कि आज हमने असहमति का सौंदर्य और चिकित्सकीय (सुधार) की दृष्टि खो दी है। विश्वसनीयता का संकट खड़ा हो गया है।
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| देश में भाषाएं मुद्दा नहीं, भाव मुद्दा है : श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी |
वरिष्ठ पत्रकार श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी ने कहा कि हम जिस हिन्दू परंपरा से आते हैं, वह संवाद की बात करती है, विवाद की नहीं। भारतीय भाषाओं के राष्ट्रीय स्वर की बात करते हैं तो हमें आदि शंकर से शुरू करना चाहिए। आदिगुरु शंकर ने कहा कि देश को एक रखने के लिए चारों कोनों पर पीठ स्थापित करनी होगी। श्री त्रिपाठी ने कहा कि इस देश में भाषाएं मुद्दा ही नहीं है, मुद्दा भाव है। भारत में कोस-कोस पर वाणी बदल जाती है, ऐसे देश में आप कितनी भाषाएं सीख सकते हैं। अगर भाव समझ जाएंगे तो भाषाएं अपने आप समझ आ जाएंगी।
उन्होंने कहा कि तथाकथित सेकुलर हमें यूनियन ऑफ स्टेट के नाम पर राज्य और भाषाओं में बांटकर देखते हैं, उन्हें बताना चाहिए कि हम 'यूनियन ऑफ स्टेट' नहीं हैं, हम उत्तर से दक्षिण तक एक सांस्कृतिक राष्ट्र हैं। प्रयागराज के संगम में जब देश के तमिलनाडु, केरल, बंगाल और अन्य प्रान्त के लोग आते हैं तो उनके कोई अंतर दिखता है क्या? पत्रकारिता में आये बदलाव पर उन्होंने कहा कि इंटरनेट ने समाज और पत्रकारिता का लोकतांत्रिकरण किया है। भारतीय भाषाओं के राष्ट्रीय स्वर को देखना है तो समाज के स्वर को देखिए। संघ के शताब्दी वर्ष का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय स्वर देने का बड़ा काम किया है। एक क्षेत्र के प्रचारक दूसरे क्षेत्र में जाकर वहां की भाषा सीखकर वहां काम करते हैं।
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| पत्रकारों की आज की पीढ़ी अधिक समृद्ध : सुश्री जयंती रंगनाथन |
वरिष्ठ पत्रकार सुश्री जयंती रंगनाथन ने पत्रकारिता के अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि मेरी मातृभाषा तमिल है लेकिन अन्य भारतीय भाषाओं ने भी मेरी पत्रकारिता को ताकत दी है। मैंने हिंदी के प्रतिष्ठित पत्र धर्मयुग से अपनी पत्रकारिता की। उन्होंने कहा कि तेलगु भाषी होने के कारण से मुझे कई बार लाभ मिला। विद्यार्थियों को एक से अधिक भाषाएं सीखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आज के पत्रकार हमारी पीढ़ी से अधिक समृद्ध है। उनकी अंगुलियों पर टेक्नोलॉजी नाचती है। अपनी पत्रकारिता में तकनीक का खूब उपयोग कीजिये। उन्होंने कहा कि हम सबको अपने काम से मोहब्बत होनी चाहिए। हमें वही काम करना चाहिए, जिसमें हमें आनंद की अनुभूति हो।
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| पत्रकारिता में कम और सार्थक बोलना जरूरी : श्री प्रतीक त्रिवेदी |
वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रतीक त्रिवेदी ने कहा कि हमें पत्रकारिता में कम बोलना, सार्थक बोलना और अपने बनाये नियम का पालन करना चाहिए। टेलीविजन ड्रामा मांगता है, इसलिए अपने विषय की प्रस्तुति पर भी ध्यान रखना चाहिए।
अपनी ख्वाहिश को खबर का रंग न दें : श्री राशिद किदवई
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक श्री राशिद किदवई ने कहा कि हम पत्रकारों को अपना आत्मावलोकन करना चाहिए। जब हम अपनी ख्वाहिश को खबर का रंग देते हैं तो हमारे गलत होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। हमें याद रखना चाहिए कि हम जो चाहते हैं, वैसे सारा समाज नहीं सोचता है। चुनाव परिणामों पर इसलिए भी पत्रकारों के विश्लेषण गलत निकल रहे हैं क्योंकि उनके विचार उनके विश्लेषण पर हावी हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य के अनुभव का विकल्प एआई में नहीं मिल सकता। जो कंटेंट एक पत्रकार अपने अवलोकन और अनुभव से लेकर आता है, वह एआई कहाँ से लाएगा क्योंकि एआई वही कंटेंट दे सकता है जो इन्टरनेट पर उपलब्ध है।
नयी पत्रकारिता में पेड न्यूज के गंभीर खतरे : श्री अनिल पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार श्री अनिल पांडेय ने कहा कि डिजिटल पत्रकारिता में एक हिस्सा पूरी तरह पेड न्यूज से प्रभावित है। आज से 10-15 वर्ष पहले जब पेड न्यूज के खतरे की बात हो रही थी, वह अब बड़े रूप में दिख रहा है। हम सबको यह प्रयास करना चाहिए कि पेड न्यूज़ के खतरे को कैसे दूर किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि तीसरे प्रेस आयोग (मीडिया आयोग) की आज आवश्यकता है। यह तय करने का समय आ गया है कि पत्रकार कौन है, यह परिभाषित हो।
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| एआई के दौर में भी मौलिक कंटेंट का महत्व : श्री अनुज खरे |
वरिष्ठ पत्रकार श्री अनुज खरे ने कहा कि आपके बनाए कंटेंट को गूगल और मेटा जैसी बड़ी मीडिया टेक कंपनी दर्शकों/पाठकों तक पहुंचा रहीं हैं। उन्होंने कहा कि एआई कंटेंट के समय में भी मौलिक कंटेंट की आवश्यकता और महत्व बहुत अधिक है। कंटेंट बनाने वालों को आत्मावलोकन करना चाहिए कि वे क्या कंटेंट बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि डिजिटल मीडिया का मार्केट 83 हजार करोड़ रुपये का है, जिसमें से 3000 करोड़ रुपये का मार्केट ही न्यूज़ के पास है।
उन्होंने बताया कि ऑस्ट्रेलिया में यह कानून है कि आप किसी वेबसाइट से कंटेंट लेते हैं तो उसका भुगतान करना होगा। वहां की सरकार ने इसकी मॉनिटरिंग की व्यवस्था बनाई है लेकिन हमारे यहां ऐसी व्यवस्था नहीं है। इसी सत्र में वरिष्ठ पत्रकार श्री शरद गुप्ता ने कहा कि मौलिक होना सबसे जरूरी है। किसी भी रिपोर्टर के लिए बाइलाइन बहुत महत्व रखती है, जो उसे मौलिक और अच्छे समाचार पर ही मिलती है।
विदेश में हिंदी पत्रकारिता के इतिहास पर शोध करने वाले श्री जवाहर कर्णावट ने कहा कि विदेश में हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को 143 वर्ष हो गए हैं। वहीं, उदन्त मार्तण्ड हिंदुस्तानियों के हित के हेत के उद्देश्य के साथ निकला इसलिए अंग्रेज उसके विरुद्ध थे। प्रारम्भ में हिंदी सत्ता के केंद्र में नहीं थी इसलिए उसका वह प्रभाव नहीं था। एक दौर था जब हवाईजहाज में सब अंग्रेजी में बात करते थे, हिंदी भाषी संकोच में चुप बैठा रहता था। अब स्थिति बदली है, अमेरिका जाने वाले विमान में भी जगजीत सिंह की हिंदी गजल सुनी जा रही हैं। यह हिंदी की ताकत है। उन्होंने कहा कि हमने अनेक काम किए लेकिन उनका क्रेडिट किसी और ने ले लिया। इसको समझाते हुए उन्होंने रेडियो के प्रयोग से लेकर हवाई जहाज के आविष्कार तक अनेक उदाहरण दिए। |
'समग्र भारतीय पत्रकारिता' के लेखक श्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि इस पुस्तक के निर्माण में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की बड़ी भूमिका रही है। भारत में भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता पर विश्वविद्यालय ने एक परियोजना शुरू की थी, जिसके अंतर्गत बहुत महत्वपूर्ण कार्य हुआ था। उन्होंने कहा कि भारत की पत्रकारिता में शुरू से प्रतिरोध का स्वर रहा है। हमारी भाषायी पत्रकारिता की शुरुआत 'हिंदुस्तानियों के हित के हेतु' के साथ ही शुरू हुई है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि हमारे यहां खोजी पत्रकारिता भी पहले से रही है। गणेश शंकर विद्यार्थी के समाचार पत्र 'प्रताप' में इसके संकेत मिलते हैं। उन्होंने कहा कि भारत की पत्रकारिता में हिंदी पत्रकारिता का सबसे अधिक योगदान रहा है।
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| कार्टूनिस्ट टीम ने कुलगुरु को उनका कार्टून भेंट किया |
इस अवसर पर डॉ. मुकेश मिश्रा ने कहा कि पत्रकारिता शास्त्र भी है और शस्त्र भी। कार्टून कला पर जो कार्यशाला हुई, वह अनुकरणीय है। इस विधा को आगे बढ़ाने के लिए हमें विशेष प्रयत्न करना चाहिए। वहीं, वीर भारत न्यास के श्री श्रीराम तिवारी ने कहा कि प्रणाम उदन्त मार्तण्ड को याद करने का सिलसिला यहीं खत्म नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि हिंदी अपने जन्म से ही प्रतिरोध की भाषा रही है।
भारत भवन के अधिकारी श्री प्रेमशंकर शुक्ला ने भी अपने विचार साझा किए। आभार ज्ञापन कुलसचिव प्रो. पी. शशिकला ने आभार ज्ञापन किया। सत्र का संचालन कार्यक्रम के संयोजक प्रो. संजय द्विवेदी ने किया। इससे पूर्व समापन सत्र में विभिन्न विभागों के विद्यार्थियों ने अपना तीन दिन के अनुभव साझा किए।




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