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Friday, May 22, 2026

हसरत मोहानी की शायरी में भाषा की मिठास, शायरी का तीखापन और शोख़ अंदाज़ साफ़ दिखाई देता है : डॉ. तक़ी आबदी

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में “मौलाना हसरत मोहानी: शख्सियत और फ़न” विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित

नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। सैयद फ़ज़लुल हसन अर्थात मौलाना हसरत मोहानी पर बहुत कम काम हुआ है। उनके जितने बड़े कारनामे हैं, उस स्तर की शोध नहीं हुई। आप एक शिक्षित परिवार से संबंध रखते थे। मौलाना हसरत मोहानी की शायरी में भाषा की मिठास, शायरी का तीखापन और शोख़ अंदाज़ बहुत सुंदर रूप में मिलता है। उनके अनुसार अश्लीलता की शायरी कोई शायरी नहीं होती। उनका एक बड़ा कमाल यह भी है कि उन्होंने शायरी को राजनीति से जोड़ा। ये शब्द अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त साहित्यकार और आलोचक तकी आबिदी (कनाडा) के थे, जो उर्दू विभाग और अंतरराष्ट्रीय उर्दू स्कॉलर्स अंजुमन (आयुसा) के तत्वावधान में आयोजित ऑनलाइन कार्यक्रम “मौलाना हसरत मोहानी : शख्सियत और फ़न” में विशेष वक्ता के रूप में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे।


उन्होंने आगे कहा कि मौलाना हसरत मोहानी की पत्रिका “उर्दू-ए-मुअल्ला” में अदब भी है, राजनीति भी और समाज भी। हसरत, हुस्न और इश्क़ के शायर हैं। उनकी शायरी में सूफ़ियाना रंग भी मिलता है। उनकी शायरी का यही सौंदर्य और विशेषता पाठकों, विशेषकर युवाओं को बहुत प्रभावित करती है। हसरत एक आशिक़-मिज़ाज शायर थे। उन्होंने बताया कि इश्क़ के लिए कोई उम्र नहीं होती। आज के स्कॉलर्स के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि वे अधिक से अधिक अध्ययन करें। हसरत ने जो मुशाहदा लिखे हैं, वे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और सबके सामने आने चाहिए। हसरत शायर भी थे, पत्रकार भी, साहित्यकार भी, आशिक़-ए-रसूल भी और देश के स्वतंत्रता सेनानी भी।


इससे पूर्व कार्यक्रम का आरंभ सईद अहमद सहारनपुरी ने पवित्र कुरआन के पाठ से किया। अध्यक्षता प्रो. सगीर अफ़राहीम (पूर्व उर्दू विभागाध्यक्ष एएमयू) ने की। विशेष वक्ता के रूप में कनाडा से प्रसिद्ध शोधकर्ता एवं आलोचक तक़ी आबिदी शामिल हुए। कार्यक्रम में आयुसा की अध्यक्षा प्रोफेसर रेशमा परवीन (लखनऊ) भी उपस्थित रहीं। स्वागत भाषण उर्दू विभाग की शोध छात्रा सैयदा मरियम इलाही ने दिया तथा कार्यक्रम का संचालन डॉ. इरशाद सियानवी ने किया।


इस अवसर पर कार्यक्रम का परिचय और अपने विचार प्रस्तुत करते हुए प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने कहा कि हसरत मोहानी की शायरी में देशभक्ति दिखाई देती है। उनकी शायरी में यथार्थ है। उन्होंने उच्च स्तर की शायरी की। बाद में ग़ज़ल के क्षेत्र में भी उन्हें अत्यधिक लोकप्रियता मिली। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो ग़ज़ल के माध्यम से इतनी प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं। हसरत ने देश की सेवा भी की, शायरी भी की और देश की स्वतंत्रता के लिए जेल भी गए।

 

प्रोफेसर रेशमा परवीन ने कहा कि आज का कार्यक्रम अत्यंत उत्कृष्ट रहा और हसरत-शिनासी के दो विशेषज्ञों ने इसे और भी गरिमामय बना दिया। आज की बातचीत वास्तव में लंबे समय तक स्मरणीय रहेगी। मौलाना हसरत मोहानी बचपन से ही मेरे प्रिय शायर रहे हैं। उनकी शायरी में बड़ी संख्या में रोमानी अशआर मिलते हैं, लेकिन कहीं भी अश्लीलता दिखाई नहीं देती। उनके अशआर में यथार्थ, रोमानी भाव और देशप्रेम मिलता है।


अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रोफेसर सगीर अफ़राहीम ने कहा कि हसरत मोहानी पर और अधिक कार्य किए जाने की आवश्यकता है। मौलाना हसरत मोहानी ने अपनी शायरी में हर विषय को अत्यंत सुंदरता और विशिष्टता के साथ प्रस्तुत किया है, चाहे वह ग़ज़ल हो, नात हो या स्वतंत्रता संग्राम की तड़प। जब हम मौलाना हसरत मोहानी को पढ़ते हैं तो उनके साथ-साथ हमें अबुल कलाम आज़ाद,शौकत अली आदि को भी पढ़ना चाहिए, क्योंकि इससे हमें अनेक महत्वपूर्ण बातें जानने को मिलती हैं। मौलाना हसरत मोहानी गर्मदिल साथियों के साथ थे और उनका व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली था।


इस अवसर पर डॉ. आसिफ अली, डॉ. शादाब अलीम, डॉ. अलका वशिष्ठ, डॉ. इफ़्फ़त ज़किया, अरीबा, फरहत अख्तर, मोहम्मद ईसा राना, मोहम्मद ज़ुबैर, महविश, नायाब, लिमरा और मोहम्मद शमशाद आदि ऑनलाइन एवं ऑफलाइन रूप से कार्यक्रम से जुड़े रहे।

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