नित्य संदेश
कविता: माटी का घर
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कितना अपना था, अपना घर ?
अपने ही थे धरती अंबर।
माटी के घर, तोड तोड कर ,
हमने ही प्रासाद बनाए।
भौतिक, यांत्रिक सुविधाओं से
प्रासादों के कक्ष सजाए।
इन कक्षों में गूंज रहे हैं,
कथित प्रगति के उन्मादी स्वर।
अपने ही थे **** 1
धुंआ उगलते चूल्हे में जब
गोल-गोल रोटी सिकती थी।
उसकी मीठी मंद गंध से
उदर क्षुधा पल-पल बढती थी।
प्रासादों की भूख भिन्न है,
नहीं बुझी, सब रिश्ते खा कर ।
अपने ही थे **** 2
लिपे छबे घर के आंगन में,
शिशुओं का वह चलना गिरना।
धरती की मृण्मयी गोद में,
माटी के संग तिल-तिल बढना।
आंगन की इस नेह रज्जु से
आबंधित तन मन जीवन भर।
अपने ही थे **** 3
कहां खो गया सांझा आंगन ?
पत्थर की दीवार खा गई ??
पश्चिम की अधुनातन शैली,
नवल पौध को रास आ गई।
इस शैली में मिटते जाते,
मन पर अंकित ढाई आखर।
अपने ही थे **** 4
पनघट का वह मीठा बतरस,
वह द्वारे का तुलसी क्यारा।
जनम, मरण और परण पलों में,
गांव सिमट आता था सारा ।
हर उत्सव सांझा उत्सव था,
सांझे थे , हर क्रंदन के स्वर।
अपने ही थे **** 5
विकसित होता मेरा भारत,
अंतरिक्ष में खेल रहा है।
वृद्ध पिता, घर के कोनें में
एकाकीपन झेल रहा है।
यह विकास की तृष्णा छोडें,
आओ ,लौट चलें अपने घर।
अपने ही थे **** 6
मैं
घर का रखवाला
जीवन


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