Thursday, April 30, 2026

सात दिवसीय राष्ट्रीय फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम का समापन


नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। आईकेएस सेल एवं समाज विज्ञान संकाय, शहीद मंगल पांडे राजकीय स्नातकोत्तर महिला महाविद्यालय मेरठ के संयुक्त तत्वावधान में प्रमुख संरक्षक प्रो बी एल शर्मा, उच्च शिक्षा निदेशक उत्तर प्रदेश और महाविद्यालय प्राचार्य प्रो अंजू सिंह के संरक्षण में न्यूक्लियस ऑफ लर्निंग एंड डेवलपमेंट के सहयोग से एम ओ यू के तहत  “जीवंत परंपराओं के रूप में भारतीय ज्ञान: समकालीन संदर्भों में लोक-साहित्य और स्वदेशी ज्ञान “ विषय पर एक साप्ताहिक राष्ट्रीय फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम (ऑनलाइन) के समापन सत्र का आज आयोजन किया गया । 


यह फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम भारतीय ज्ञान प्रणालियो, लोककथाओं और स्वदेशी ज्ञान परंपराओं पर केंद्रित रहा । जिसमें मौखिक परंपरा, स्मृति, रीति-रिवाजों, नैतिकता और सामुदायिक प्रथाओं में गहरी जड़ें जमाए हुए, भारतीय ज्ञान परंपराओं में दर्शनशास्त्र, पारिस्थितिकी, चिकित्सा प्रणालियाँ, प्रथागत कानून, सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ शामिल रहीं । इस FDP का उद्देश्य यह पता लगाना था कि लोककथाएँ और स्वदेशी प्रथाएँ किस प्रकार ऐसे ज्ञानमीमांसीय ढाँचों के रूप में कार्य करती हैं, जो ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाते हैं और बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों के अनुसार स्वयं को ढाल लेते हैं। इसमें भारत की जनजातीय और लोक परंपराओं पर विशेष ध्यान दिया गया, जिसमें आधुनिक दुनिया में उनकी निरंतरता, नवाचार और प्रासंगिकता को उजागर करने का प्रयास किया गया। 


यह कार्यक्रम समकालीन चिंताओं, जैसे कि स्थायित्व, शिक्षा नीति (NEP 2020), सांस्कृतिक पहचान और अंतर्विषयक शिक्षाशास्त्र से भी जुड़ा रहा । कार्यक्रम का शुभारंभ एफडीपी समन्वयक प्रो लता कुमार द्वारा सभी के स्वागत भाषण से हुआ । कार्यक्रम की मुख्य वक्ता व विषय विशेषज्ञ डॉ. सास्वती बारदोलोई सहायक प्रोफेसर एवं. सह-समन्वयक, भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) सेल, असम रॉयल ग्लोबल यूनिवर्सिटी, गुवाहाटी, असम रहीं । रहीं जिन्होंने एक सप्ताह में भारतीय ज्ञान प्रणालियों की नींव: अवधारणाएँ, स्रोत और ज्ञानमीमांसाएँ, ज्ञान के रूप में लोककथाएँ: मौखिक परंपरा, स्मृति और सांस्कृतिक हस्तांतरण, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियाँ: जनजातीय प्रथाएँ, प्रथागत कानून और सामुदायिक ज्ञान, भारतीय ज्ञान परंपराओं में निरंतरता, परिवर्तन और नवाचार तथा भारतीय ज्ञान प्रणालियों को पाठ्यक्रम, अनुसंधान और नीति में एकीकृत करना विषय पर अपने व्याख्यान प्रस्तुत किए।


इस FDP के अपेक्षित परिणाम निम्न प्रकार थे, भारतीय ज्ञान प्रणालियों की वैचारिक नींव, स्रोतों और ज्ञानमीमांसीय ढाँचों को समझना, तथा समकालीन शैक्षणिक विमर्श में उनकी प्रासंगिकता को पहचानना।, लोककथाओं और मौखिक परंपराओं का एक संरचित ज्ञान प्रणाली के रूप में विश्लेषण करना; साथ ही, सांस्कृतिक ज्ञान के हस्तांतरण में मौखिक परंपरा, स्मृति और प्रस्तुति (performance) की भूमिका को पहचानना।, सामाजिक संगठन और ज्ञान के प्रभावी मॉडलों के रूप में, स्वदेशी और जनजातीय ज्ञान प्रणालियों—जिनमें प्रथागत कानून और समुदाय-आधारित प्रथाएँ शामिल हैं—का परीक्षण करना, आधुनिक सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों के जवाब में, भारतीय ज्ञान परंपराओं के भीतर निरंतरता, अनुकूलन और नवाचार की प्रक्रियाओं का मूल्यांकन करना तथा पाठ्यक्रम निर्माण, अनुसंधान पद्धतियों और नीति-उन्मुख शैक्षणिक पहलों में भारतीय ज्ञान प्रणालियों, लोक-साहित्य और स्वदेशी ज्ञान को एकीकृत करने के लिए रणनीतियाँ विकसित करना। 


अंतिम दिवस में मुख्य वक्ता द्वारा पाठ्यक्रम निर्माण, अनुसंधान पद्धतियों और नीति-उन्मुख शैक्षणिक पहलों में भारतीय ज्ञान प्रणालियों, लोक-साहित्य और स्वदेशी ज्ञान को एकीकृत करने के लिए रणनीतियाँ विकसित करने संबंधी विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों द्वारा प्रश्न पूछे गए। रिसोर्स पर्सन द्वारा सभी प्रश्नों का संतोषजनक, स्पष्ट एवं उदाहरणों सहित उत्तर दिया गया। कार्यक्रम का समापन प्रो ० भारती दीक्षित द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। कार्यक्रम में ऑनलाइन माध्यम से 100 से अधिक प्रतिभागी शामिल रहे । कार्यक्रम के सफल समापन में आयोजन समिति के सदस्यों प्रो मंजु रानी. प्रो अनुजा गर्ग, प्रो गीता चौधरी, डा भारती शर्मा और डा नितिन चौधरी का विशेष योगदान रहा।

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