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Wednesday, October 30, 2024

सतत विकास और विकसित भारत हेतु अनुसंधान, नवाचार एवं बौद्धिक संपदा अधिकार पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का हुआ आयोजन



देश विदेश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, शोधकर्ताओं एवं विशेषज्ञों ने दिया व्याख्यान

अनम शेरवानी 
नित्य संदेश, मेरठ। स्वामी विवेकानन्द सुभारती विश्वविद्यालय के अनुसंधान विकास प्रकोष्ठ के सहयोग से बहुविषयक अध्ययन व अनुसंधान केन्द्र द्वारा सतत विकास और विकसित भारत हेतु अनुसंधान, नवाचार एवं बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) विषय पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसमें देश विदेश के विख्यात वैज्ञानिक, अनुसंधानकर्ता एवं विशेषज्ञों ने अपने विचार रखें।

कार्यक्रम का शुभारंभ सत्यजीत रे प्रेक्षागृह में मुख्य अतिथि आणविक एमेजिंग व अनुसंधान केन्द्र, आईएनएमएएस नई दिल्ली के वैज्ञानिक डॉ. अनिल मिश्रा, उज़्बेकिस्तान से अनुवंशिकी व पादप प्रायोगिक जीवविज्ञान अकादमी ऑफ साइंस की प्रोफेसर दिलफ़ुज़ा जाब्बारोवा, उज़्बेकिस्तान नेशनल यूनिवर्सिटी से माइक्रोबायोलॉजी व बायोटेक्नोलॉजी की प्रोफेसर शेकशिता ताशमुखा मेडोवा, उज़्बेकिस्तान नेशनल यूनिवर्सिटी से माइक्रोबायोलॉजी व बायोटेक्नोलॉजी की प्रोफेसर ज़ुखरा कादिरोवा, इंटरनेशनल एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी उज़्बेकिस्तान के कृषि विज्ञान व व्यवसाय संकाय के डीन जाखोंगिर अलीमोव, उज़्बेकिस्तान नेशनल यूनिवर्सिटी से माइक्रोबायोलॉजी व बायोटेक्नोलॉजी की प्रोफेसर सितोरा समादिया, बांग्लादेश के पूर्व निदेशक डीऑफ व मत्सय वैज्ञानिक डॉ.बिनय कुमार चक्रवर्ती, स्वामी विवेकानन्द सुभारती विश्वविद्यालय के कुलपति मेजर जनरल डॉ.जी.के. थपलियाल, मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ.शल्या राज, अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के मुख्य संयोजक व डीन अकादमिक एवं अनुसंधान निदेशक प्रोफेसर एपी गर्ग ने दीप प्रज्जवलित कर किया।
 
कुलपति मेजर जनरल डॉ. जी.के.थपलियाल ने सभी अतिथियों का विश्वविद्यालय आगमन पर अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय देश हित में नवाचारों की दिशा में तेजी से कार्य कर रहा है। भारत को विकसित बनाने हेतु आर्थिक विकास, कौशल विकास, सामाजिक समावेश, पर्यावरण संरक्षण और दूरदर्शी नेतृत्व के बीच संतुलन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हमारे देश में पारंपरिक ज्ञान का भंडार है, बौद्धिक संपदा के अंतर्गत वैश्विक स्तर पर हो रहे बदलाव को देखते हुए सुभारती विश्वविद्यालय प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रहा है।

मुख्य अतिथि आणविक एमेजिंग व अनुसंधान केन्द्र, आईएनएमएएस नई दिल्ली के वैज्ञानिक डॉ. अनिल मिश्रा ने कहा कि सतत विकास और विकसित भारत हेतु अनुसंधान, नवाचार एवं बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) का विषय अति महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि भारत के विकास में देश के नागरिकों की भूमिका एवं उनके विकास का अधिक महत्व है। उन्होंने कहा कि जीवन के हर पहलू में विज्ञान तकनीक व शोध को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। नवाचारों से ही विकास के पथ में सुलभता आती है एवं विकसित भारत हेतु समाज के हर स्तर पर शोध से सकारात्मक परिणाम आ रहे है। उन्होंने सुभारती विश्वविद्यालय के अनुसंधान विकास प्रकोष्ठ के सहयोग से बहुविषयक अध्ययन व अनुसंधान केन्द्र द्वारा सतत विकास और विकसित भारत हेतु अनुसंधान, नवाचार एवं बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) विषय पर आयोजित भव्य अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन पर हर्ष प्रकट करते हुए अपनी शुभकामनाएं दी।

इंटरनेशनल एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी उज़्बेकिस्तान के कृषि विज्ञान व व्यवसाय संकाय के डीन जाखोंगिर अलीमोव ने कहा कि आईपीआर का प्रमुख उद्देश्य देश के आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए वाणिज्यिक लाभ, साझा प्रौद्योगिकी, नवाचार और उपयोगकर्ता देशों द्वारा किए गए सर्वाेत्तम वैश्विक प्रयासों के बारे में जानकारी का प्रसार करना है। उन्होंने आईपीआर की आवश्यकता पर जोर दिया और स्टार्ट अप और उद्यमिता के रूप में अनुसंधान परिणामों के लिए अवसर के बारे में भी जानकारी दी।

बांग्लादेश के पूर्व निदेशक डीऑफ व मत्स्य वैज्ञानिक डॉ.बिनय कुमार चक्रवर्ती ने कहा कि टिकाऊ जलीय कृषि उत्पादन प्रणालियों को डिजाइन करने के लिए पर्यावरणीय परिणामों और शमन रणनीतियों की समझ की आवश्यकता होती है। 2050 तक, जलीय कृषि में समुद्री खाद्य उत्पादन का अधिकांश हिस्सा शामिल होगा, जिसमें समुद्री शैवाल के अलावा फिनफिश और अन्य अकशेरुकी शामिल होंगे। बढ़ती नौ अरब मानव आबादी को जलीय कृषि और मत्स्य पालन सहित टिकाऊ और स्वस्थ खाद्य उत्पादन प्रणालियों की आवश्यकता है, जिसके लिए समुद्री शैवाल और अन्य समुद्री खाद्य उत्पादों का पूरी तरह से उपयोग करने के लिए खपत पैटर्न में बदलाव की आवश्यकता है।

उज़्बेकिस्तान से अनुवंशिकी व पादप प्रायोगिक जीवविज्ञान अकादमी ऑफ साइंस की प्रोफेसर दिलफ़ुज़ा जाब्बारोवा ने कहा कि बौद्धिक संपदा को दिमागी उपज कहा जाता है, इसका उपयोग आविष्कारकर्ता ही कर सकता है। उन्हांेने कहा कि अनुसंधान व नवाचार ही विकास की नीव होती है, इसके सहयोग से देश के आधारभूत संरचना को सशक्त किया जा सकता है।

अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के मुख्य संयोजक व डीन अकादमिक एवं अनुसंधान निदेशक प्रोफेसर एपी गर्ग ने सम्मेलन से आए अतिथियों को धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने कहा कि विकसित भारत एक व्यापक रणनीति है, जो प्रगति के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और तकनीकी पहलुओं को शामिल करती है। इस संबंध में भारत के उच्च शिक्षण संस्थान ज्ञान, रचनात्मकता और उच्च योग्य लोगों के संसाधनों के केंद्र के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने बताया कि सम्मेलन में देश विदेश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, शोधकर्ता एवं विशेषज्ञों ने अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के विषय सतत विकास और विकसित भारत हेतु अनुसंधान, नवाचार एवं बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) पर अपने अनुभव विचार साझा कर सभी का ज्ञान वर्धन किया। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रबंधन सहित सभी अतिथियों का आभार प्रकट किया।

अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में उज़्बेकिस्तान नेशनल यूनिवर्सिटी से माइक्रोबायोलॉजी व बायोटेक्नोलॉजी की प्रोफेसर शेकशिता ताशमुखा मेडोवा, उज़्बेकिस्तान नेशनल यूनिवर्सिटी से माइक्रोबायोलॉजी व बायोटेक्नोलॉजी की प्रोफेसर ज़ुखरा कादिरोवा, उज़्बेकिस्तान नेशनल यूनिवर्सिटी से माइक्रोबायोलॉजी व बायोटेक्नोलॉजी की प्रोफेसर सितोरा समादिया, जर्मनी से डॉ. क्रिस्टोफर, लॉ एंजिल्स कैलिफोर्निया यूएसए से प्रिंसिपल साइंटिस्ट माइक्रोबायोलॉजी फार्मावाइट एलएलसी डॉ.जगपाल सिंह, यूएस से मोनिका गुप्ता, रिसर्च सेंटर ट्राईसाए रोटोंडेला एमटी एटली से वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. वी.के.शर्मा, राष्ट्रीय मृदा विज्ञान अनुसंधान केन्द्र नेपाल से प्रमुख व वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रसाद विस्टा, कैलिफोर्निया से फार्म कॉन कंपनी की वैज्ञानिक डॉ.दीपा, यूएस के स्वास्थ्य देखभाल प्रोग्राम निदेशक डॉ.बाजीराव पाटिल, जर्मनी से यूरोपियन मेडिकल एसोसिएशन की प्रोफेसर अमिना अख़्तर, ईएचएस विशेषज्ञ न्यूजीलैंड से डॉ. मूविन खान, नेशनल यूनिवर्सिटी उज़्बेकिस्तान के बॉयोलॉजी से डॉ. सोकिबजान अबदुसमातोव ने अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के विषय पर संबोधित करते हुए अपने विचार रखकर सभी का ज्ञान वर्धन किया।
 
मंच का संचालन डॉ. नेहा वर्मा ने किया। इस अवसर पर आयोजन समिति के सभी सदस्यों का सहयोग रहा।

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