चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में जश्न-ए-सर सैयद समारोह का शुभारंभ
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रो. अतवीर सिंह ने कहा कि सर सैयद जैसी महान हस्तियों पर इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करना अत्यंत आवश्यक है। ऐसे कार्यक्रमों से विद्यार्थियों को उचित मार्गदर्शन मिलता है। केवल शिक्षा प्राप्त करने की प्रवृत्ति ही आवश्यक नहीं है, बल्कि शिक्षा का उद्देश्य भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। शिक्षा के साथ-साथ अच्छा संस्कार और उच्च मानवीय मूल्य भी आवश्यक हैं। शिक्षा किसी विशेष वर्ग या संप्रदाय के लिए नहीं, बल्कि सभी के लिए जरूरी है। हमें केवल अपनी बात कहनी ही नहीं चाहिए, बल्कि दूसरों को सुनना भी सीखना चाहिए। जिसने दूसरों को सुनना सीख लिया, समझिए कि उसने बहुत बड़ा कार्य कर लिया।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र ही नहीं, बल्कि संस्कार और व्यक्तित्व निर्माण का भी संस्थान है। यह विश्वविद्यालय हमें अपने बड़ों का सम्मान करना भी सिखाता है। आज जितने लोग शाहरुख खान को जानते हैं, उतने ही लोग सर सैयद को भी जानते हैं। मेरा मानना है कि सर सैयद पर जितना शोध कार्य हुआ है, उतना शायद ही भारत की किसी अन्य महत्त्वपूर्ण हस्ती पर हुआ हो। अब तक सर सैयद पर 597 पीएचडी हो चुकी हैं। यह शोध केवल उर्दू भाषा में ही नहीं, बल्कि हिंदी, तेलुगु, मलयालम सहित अन्य भाषाओं और विषयों में भी हुआ है। इसके अतिरिक्त, दुनिया भर की लगभग 97 विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सर सैयद पर शोध-पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। ये विचार चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. जमाल अहमद सिद्दीकी ने व्यक्त किए। वे विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग और सर सैयद एजुकेशनल सोसाइटी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय जश्न-ए-सर सैयद के उद्घाटन समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में बोल रहे थे। उन्होंने आगे कहा कि यदि हमें सर सैयद से प्रेम है, तो हमें उन पर अधिक से अधिक शोध करना चाहिए और उनके शैक्षिक मिशन को आगे बढ़ाना चाहिए।
कार्यक्रम का शुभारंभ मोहम्मद नदीम द्वारा पवित्र कुरआन के पाठ से हुआ। फरहत अख्तर ने नात प्रस्तुत की। इसके बाद अतिथियों ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित किया। कार्यक्रम के मुख्य संरक्षक और मुख्य अतिथि कला संकायाध्यक्ष प्रो. अतवीर सिंह तथा संरक्षक प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. असलम जमशेदपुरी रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता सर सैयद एजुकेशनल सोसाइटी, मेरठ के अध्यक्ष डॉ. हाशिम रज़ा ज़ैदी ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो. जमाल अहमद सिद्दीकी उपस्थित रहे। सम्मानित अतिथिगणों में प्रसिद्ध शायर डॉ. ज़की तारिक, प्रसिद्ध कथा-आलोचक खुर्शीद हयात, मौलाना नायाबुद्दीन नायाब, आफाक अहमद खान और फैज़ महमूद ने सहभागिता की। स्वागत भाषण डॉ. इरशाद स्यानवी ने दिया, कार्यक्रम का संचालन डॉ. शादाब अलीम ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अलका वशिष्ठ ने प्रस्तुत किया।
फैज़ महमूद ने कहा कि सर सैयद ने अलीगढ़ जैसा शैक्षिक संस्थान स्थापित करके एक महान कार्य किया। आज वहां से शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया में अपने संस्थान और देश का नाम रोशन कर रहे हैं। मैं स्वयं को बहुत सौभाग्यशाली मानता हूं कि इतनी महान हस्ती के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम में भाग ले रहा हूं। इस प्रकार के कार्यक्रम निरंतर आयोजित होते रहने चाहिए। आफाक अहमद खान ने कहा कि सर सैयद अहमद खान ने अंग्रेजों के साथ भी सद्भावपूर्ण व्यवहार किया और उनसे अनेक कार्य करवाए। उन्होंने इंग्लैंड जाकर वहां की शिक्षा व्यवस्था को समझा और फिर भारत में उसे स्थापित करने का प्रयास किया। सर सैयद ने समाज को आधुनिक शिक्षा से परिचित कराया। इसी उद्देश्य से साइंटिफिक सोसाइटी की स्थापना भी की गई थी। उन्होंने एक छोटे से मदरसे की स्थापना की और उसे आगे चलकर विश्वविद्यालय के रूप में विकसित करने का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने पूरी दुनिया में शिक्षा के प्रसार का कार्य किया। महिला शिक्षा पर भी उन्होंने विशेष बल दिया। उनका मानना था कि हिंदू और मुसलमान भारत की दो खूबसूरत आंखें हैं। हमें इस बात का अफसोस है कि हम अब तक दूसरे सर सैयद को जन्म नहीं दे सके।
मौलाना सैयद नायाबुद्दीन नायाब ने कहा कि सर सैयद और उस समय के कुछ उलेमा के बीच वैचारिक मतभेद थे। मौलाना कासिम नानौतवी और सर सैयद, दोनों की रचनाएं प्रकाशित हो रही थीं। उस समय नानौतवी स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ा रहे थे और सर सैयद के कार्यों की भी सराहना करते थे। दोनों के विचारों में अंतर था, लेकिन उनके कार्यों में मतभेद नहीं था। खुर्शीद हयात ने कहा कि जब हम सर सैयद को याद करते हैं, तो हमें अज़ीज़ुन्निसा को भी याद करना चाहिए, क्योंकि वे उनकी माता थीं। सर सैयद के व्यक्तित्व निर्माण में उनकी माता अज़ीज़ुन्निसा के संस्कारों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। जब माताएं अपनी संस्कृति और समाज से जुड़ी रहती हैं, तो पूरे समाज में एक बड़ा परिवर्तन दिखाई देता है।
डॉ. ज़की तारिक ने कहा कि सर सैयद ने जो सपना देखा था, उसकी साकार तस्वीर आज नई पीढ़ी में दिखाई देती है। किसी विश्वविद्यालय में इस प्रकार के कार्यक्रम कम ही देखने को मिलते हैं। आज लोग चंदा तो खूब एकत्र करते हैं। सर सैयद ने भी शिक्षा के लिए चंदा एकत्र किया था और आज भी लोग ऐसा करते हैं, लेकिन सर सैयद के प्रयासों से एक विश्वविद्यालय की स्थापना संभव हुई। आज के दौर में चंदा एकत्र करने वाले लोगों को इस बात पर विचार करने की आवश्यकता है कि उस धन का उपयोग समाज और शिक्षा के विकास के लिए किस प्रकार किया जाए।
प्रो. असलम जमशेदपुरी ने कहा कि सर सैयद के व्यक्तित्व के अनेक पहलू हैं। उनके किसी एक पहलू पर भी चर्चा की जाए, तो कई पुस्तकें लिखी जा सकती हैं। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उनके संदेश को आगे कैसे बढ़ाया जाए। हमें सर सैयद के विचारों को घर-घर और स्कूल-स्कूल तक पहुंचाना होगा। उनके व्यक्तित्व के अनेक ऐसे पक्ष हैं, जिन पर शोध किए जाने की आवश्यकता है। अन्य भाषाओं में सर सैयद पर जो कार्य हुआ है, उसका भी अध्ययन किया जाना चाहिए। शिक्षा का प्रसार ही सर सैयद का मूल उद्देश्य था।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. हाशिम रज़ा ज़ैदी ने कहा कि सर सैयद पर अभी और शोध किए जाने की आवश्यकता है। दुनिया उन्हीं लोगों को याद रखती है, जो यहां आकर उसकी तस्वीर बदल देते हैं। सर सैयद ने पूरे समुदाय और देश की तकदीर बदल दी। वे बहुत अधिक लिखा करते थे। उनके प्रमुख कार्यों में धार्मिक और शैक्षिक गतिविधियों के अतिरिक्त पत्रकारिता भी शामिल थी। सर सैयद ने शिक्षा के साथ-साथ विज्ञान पर भी विशेष बल दिया। वे जहां भी गए, वहां संस्थान स्थापित करने का प्रयास किया। उन्हें सहयोग देने वाले साथी भी बहुत योग्य और समर्पित थे।
कार्यक्रम में डॉ. आसिफ अली, इंजीनियर रिफअत जमाली, मोहम्मद आबिद अली कासमी, सैयदा मरियम इलाही, शाहवेज़ आलम, मोहम्मद अमजद, मोहम्मद इमरान, मोहम्मद शमशाद, सईद अहमद सहारनपुरी सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।

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