
डॉ. प्रगति जैन
पर्युषण पर्व का पहला दिन युवाओं को सिखाता है — माफ़ी माँगना कमज़ोरी नहीं, सबसे बड़ी ताकत है|
हर साल पर्युषण पर्व की शुरुआत एक ऐसे शब्द से होती है, जो सुनने में जितना सरल लगता है, जीने में उतना ही कठिन है — क्षमा। दिगंबर जैन समाज में पर्युषण के पहले दिन को "उत्तम क्षमा धर्म" के रूप में मनाया जाता है। यह सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पूरी कला है और आज के दौर में, जब रिश्ते एक स्वाइप, एक स्टेटस या एक "सीन ज़ीरो" से टूट जाते हैं, यह सोच पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी हो गई है।
"सॉरी" टाइप करना आसान है, माफ़ करना नहीं। आज के दौर में माफ़ी माँगना एक इमोजी या एक मैसेज जितना आसान लगता है। लेकिन उत्तम क्षमा इससे कहीं गहरी बात कहती है — यह सिर्फ माफ़ी माँगने की नहीं, बल्कि दिल से माफ़ करने की बात है। किसी दोस्त से हुई बहस हो, ग्रुप चैट में हुई गलतफहमी हो, या पेरेंट्स से मतभेद, असली उत्तम क्षमा तब होती है जब हम अंदर से भी उस बात को जाने देते हैं, सिर्फ ऊपर से "इट्स ओके" नहीं कहते।
आज की जनरेशन एंग्जायटी, ओवरथिंकिंग और तुलना की भावना से जूझ रही है। सोशल मीडिया पर एक कमेंट, कॉलेज में कोई कम्पटीशन, या दोस्ती में कोई गलतफहमी, छोटी-छोटी बातें मन में गांठ बनकर बैठ जाती हैं। जैन दर्शन कहता है कि क्रोध और गुस्सा जिसे हम "दूसरे को सज़ा देना" समझते हैं, असल में वह सबसे पहले हमें खुद को ही जलाता है। उत्तम क्षमा हमें सिखाती है: गुस्से को होल्ड मत करो जैसे फोन में पड़ी पुरानी, बेकार फाइल्स डिलीट करते हो, वैसे ही मन से पुरानी नाराज़गी डिलीट करना सीखो।
माफ़ी एक कमज़ोरी नहीं, कॉन्फिडेंस की निशानी है, जो व्यक्ति गलती मानकर माफ़ी माँग सकता है, वही असल में मज़बूत है। मेंटल पीस का शॉर्टकट है क्षमा: बिना किसी थेरेपी या मेडिटेशन ऐप के, सिर्फ किसी को दिल से माफ़ कर देने से भी मन हल्का हो जाता है।
रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कैसे अपनाएँ?
• पर्युषण का यह पहला दिन हमें याद दिलाता है कि क्षमा कोई एक दिन की रस्म नहीं, बल्कि रोज़ का अभ्यास होनी चाहिए:
• सोने से पहले "मेंटल क्लीन-अप" करो— दिनभर में अगर किसी बात से मन कड़वा हुआ हो, तो सोने से पहले उसे जाने दो।
• रिश्तों में ईगो नहीं, ईमानदारी रखो: दोस्त, भाई-बहन या पार्टनर से हुई नोकझोंक में पहले "सॉरी" कहने से कोई छोटा नहीं होता।
• खुद को भी माफ़ करना सीखो। गलतियों पर खुद को कोसते रहना भी एक तरह की हिंसा है। खुद के प्रति भी उत्तम क्षमा ज़रूरी है।
इस पर्युषण, सिर्फ धार्मिक रस्म के तौर पर नहीं, बल्कि एक जीवनशैली के तौर पर उत्तम क्षमा को अपनाइए — क्योंकि माफ़ करना सीखना, असल में खुद से प्यार करना सीखना है।
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