Thursday, September 3, 2026

बच्चों की शिक्षा और शख्सियत में उर्दू और उर्दू के अख़बार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है : प्रो. सगीर अफ़राहीम



सरकारी और निजी स्कूलों में उर्दू के अस्तित्व के लिए हम सभी को विचार करना चाहिए : प्रो. असलम जमशेदपुरी


नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। यदि बच्चा घर के वातावरण में रहता है तो उस वातावरण को सुखद बनाने में उर्दू की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। यदि घर का वातावरण उर्दूमय हो जाए तो यह एक पूरी संस्कृति और तहज़ीब को आगे बढ़ाने का माध्यम बनेगा। घर में उर्दू का अख़बार मंगाना भी आवश्यक है। बच्चों की शिक्षा और शख्सियत में उर्दू तथा उर्दू के अख़बार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। माता-पिता को भी उर्दू के प्रति निराश नहीं होना चाहिए। उन्हें स्कूल के प्रधानाचार्य से जाकर यह पूछना चाहिए कि हमारा बच्चा उर्दू में कमजोर क्यों है। हम केवल स्कूलों को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। स्कूल वाले उर्दू के लिए जितना कर रहे हैं, वह अपनी जगह उचित है, क्योंकि यदि हम स्वयं गंभीर नहीं हैं तो स्कूल वालों को भी इसके लिए प्रेरित करने की आवश्यकता महसूस नहीं होगी। बच्चों के माता-पिता उर्दू के प्रति चिंतित नहीं हैं। हमारे बच्चे मस्जिदों में कुरआन का अनुवाद अंग्रेज़ी में पढ़ते हैं, लेकिन उन्हें उर्दू में रुचि नहीं है। हमें अपनी कौम के दर्द को महसूस करना होगा। देश की स्वतंत्रता से पहले बड़ी संख्या में उर्दू माध्यम के स्कूल हुआ करते थे, लेकिन आज उनमें से अधिकांश समाप्त हो चुके हैं।


ये विचार प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रोफेसर सगीर अफ़राहीम ने चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग और आयुसा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम “उर्दू की प्राइमरी शिक्षा : स्थिति और संभावनाएँ” में अपने अध्यक्षीय संबोधन के दौरान व्यक्त किए। कार्यक्रम का शुभारंभ सईद अहमद सहारनपुरी ने पवित्र कुरआन के पाठ से किया।कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में मुहम्मद तैयब, प्रधानाचार्य, जे.एस. जूनियर हाई स्कूल, गाज़ीपुर तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में मिर्ज़ा मिनहाजुद्दीन, वसीम अहमद, मुहम्मद इमरान और जावेद अली (सहायक अध्यापक) ने सहभागिता की। वक्ता के रूप में आयुसा की अध्यक्षा प्रोफेसर रेशमा परवीन भी उपस्थित रहीं। स्वागत भाषण सैयदा मरियम इलाही ने दिया। कार्यक्रम का संचालन इरफ़ान आरिफ़ (जम्मू) ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. इरशाद सियानवी ने प्रस्तुत किया। आयुसा के सचिव डॉ. इरशाद सियानवी ने कहा कि उर्दू की प्राथमिक शिक्षा आज का एक महत्वपूर्ण विषय है, जो वर्तमान समय में मदरसों, स्कूलों और भाषा के विकास से जुड़ा हुआ है। प्राथमिक स्तर पर उर्दू शिक्षा के सामने आज अनेक समस्याएँ और नई प्रवृत्तियाँ हैं। इन समस्याओं के साथ-साथ कई परिवर्तन भी दिखाई दे रहे हैं। इनमें उर्दू शिक्षकों की कमी, आधुनिक उर्दू की प्राथमिक स्तर की पुस्तकों का अभाव तथा उर्दू का रोजगार से पर्याप्त रूप से जुड़ा न होना प्रमुख समस्याएँ हैं। इसके साथ कुछ सकारात्मक सुविधाएँ भी सामने आ रही हैं। सुंदर डिजाइन और आकर्षक चित्रों के साथ उर्दू की प्राथमिक स्तर की पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं। निजी मदरसों और स्कूलों में धार्मिक शिक्षा के साथ उर्दू भाषा को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।


इस अवसर पर प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने विषय की भूमिका प्रस्तुत करते हुए कहा कि आज के कार्यक्रम का विषय अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट है। शिक्षा की नींव मजबूत करने का कार्य प्राथमिक स्तर के शिक्षक करते हैं। मेरी अपनी शिक्षा की शुरुआत भी प्राथमिक विद्यालय से हुई। मैंने स्वयं प्राइमरी विद्यालय में 150 रुपये के वेतन पर काम किया है। उच्च शिक्षा से जुड़े लोगों का प्राथमिक शिक्षा से कोई संपर्क नहीं है, जो एक बड़ी कमी है। यदि हमें उर्दू के वृक्ष की जड़ों को सींचना है तो प्राथमिक शिक्षा पर विशेष जोर देना होगा।उन्होंने कहा कि आज उर्दू के विकास के मार्ग में अनेक समस्याएँ बाधा बनी हुई हैं। वर्तमान समय में उर्दू में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वालों की संख्या भी कम होती जा रही है। उर्दू भाषा का उद्देश्य दिलों को जोड़ना है। अन्य भाषाओं की तरह उर्दू भी रोजगार के अवसर प्रदान करती है। सरकारी और निजी स्कूलों में उर्दू के अस्तित्व एवं संरक्षण के लिए हम सभी को गंभीरता से विचार करना चाहिए।


अपने विचार व्यक्त करते हुए मुहम्मद तैयब ने कहा कि उर्दू की कमी का एक कारण यह भी है कि उर्दू शिक्षक होने के बावजूद अनेक शिक्षक उर्दू का अख़बार तक नहीं मंगाते और न ही उर्दू की साहित्यिक बैठकों अथवा अन्य कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। मैं ऐसे उर्दू शिक्षकों से अनुरोध करता हूँ, जो उर्दू के माध्यम से रोज़गार से जुड़े हुए हैं कि उन्हें उर्दू सिखाने, पढ़ाने और उर्दू के विकास के लिए सक्रिय रूप से कार्य करना चाहिए। वसीम अहमद ने कहा कि हमारे पाठ्यक्रम में उर्दू को विशेष रूप से शामिल कर बच्चों को उर्दू पढ़ाने का प्रयास किया जाना चाहिए। हमारी पाठ्य-पुस्तकें भी आसानी से उपलब्ध नहीं होतीं। उर्दू को घर-घर तक पहुँचाना हमारी जिम्मेदारी है। हम उर्दू की जगह दूसरी भाषाएँ पढ़ाते हैं या दूसरे कार्यों में लग जाते हैं। हमारे यहाँ उर्दू के पाठ्यक्रम की भी कमी है, जिसे पूरा करना आवश्यक है।


मिर्ज़ा मिनहाजुद्दीन ने कहा कि आज उर्दू के अनेक शिक्षकों की अपनी उर्दू भी कमजोर है। हम उर्दू के नाम पर नौकरी करते हैं, लेकिन हमसे दूसरे कार्य लिए जाते हैं। उर्दू शिक्षकों का रुझान भी उर्दू शिक्षण की ओर नहीं है और न ही वे समाज के बच्चों के भविष्य के प्रति चिंतित दिखाई देते हैं। स्कूल के जिम्मेदार लोगों को भी उर्दू की प्राथमिक शिक्षा से कोई विशेष सरोकार नहीं है। इसी कारण उर्दू के विद्यार्थी आगे चलकर उर्दू विषय छोड़ देते हैं और दूसरे विषयों को प्राथमिकता देने लगते हैं। इस स्थिति पर हमें गंभीरता से विचार करना होगा।


प्रोफेसर रेशमा परवीन ने कहा कि लखनऊ के अनेक लोग दूसरे देशों में रहकर भी उर्दू की प्राथमिक शिक्षा पर जोर दे रहे हैं और अपनी भाषा को मजबूत बनाने के लिए प्रयासरत हैं। हममें से कुछ लोग आज भी ऐसे हैं, जो उर्दू के लिए पर्याप्त त्याग कर सकते हैं। हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उर्दू का विकास किस प्रकार किया जाए। लखनऊ में उर्दू के अनेक कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं और वहाँ उर्दू शिक्षकों को वेतन भी स्वयं प्रदान किया जाता है। कार्यक्रम में प्रसिद्ध शायर सैयद नायाबुद्दीन नायाब ने शिक्षक दिवस के संदर्भ में एक सुंदर कविता भी प्रस्तुत की। कार्यक्रम से डॉ. अरशद इकराम (सऊदी अरब), डॉ. वसी आज़म अंसारी, डॉ. आसिफ अली, डॉ. शादाब अलीम, डॉ. अलका वशिष्ठ, मुहम्मद शमशाद तथा अन्य छात्र-छात्राएँ ऑनलाइन जुड़े रहे।

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