Tuesday, September 8, 2026

डॉ. यूनुस ग़ाज़ी के क़त्आत मुरक़्क़ा-निगारी का उत्कृष्ट उदाहरण हैं : प्रो. फ़ारूक़ बख़्शी


उर्दू विभाग, सीसीएस विश्वविद्यालय, मेरठ में डॉ. मुहम्मद यूनुस ग़ाज़ी की काव्य-कृतियों ‘लिल्लाहिल हम्द’ और ‘शुअरा-ए-दबिस्ताने मेरठ’ का भव्य लोकार्पण


नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। मेरठ कॉलेज में कई ऐसी साहित्यिक विभूतियाँ भी आईं, जिन्होंने यहाँ की मिट्टी को ही अपना जीवन-आधार बना लिया। ऐसे ही शिक्षकों में डॉ. यूनुस ग़ाज़ी का नाम भी शामिल है, जिन्होंने यहाँ रहते हुए अनेक पुस्तकों की रचना की। आज यहाँ उनकी दो पुस्तकों—‘शुअरा-ए-दबिस्ताने मेरठ’ (क़त्आत का संग्रह) और ‘लिल्लाहिल हम्द’ (हम्दिया संग्रह)—का लोकार्पण किया गया। दोनों पुस्तकें अत्यंत उत्कृष्ट हैं। उनकी शैली और अभिव्यक्ति का ढंग बेजोड़ है। इन क़त्आत में नवीनता है और ये मुरक़्क़ा-निगारी का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। यह ऐसी रचना है जिसने एक प्रामाणिक साहित्यिक स्थान प्राप्त किया है।


ये विचार प्रसिद्ध शायर एवं उर्दू विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर फ़ारूक़ बख़्शी ने उर्दू विभाग के तत्वावधान में आयोजित डॉ. मुहम्मद यूनुस ग़ाज़ी की काव्य-कृतियों ‘लिल्लाहिल हम्द’ और ‘शायरान-ए-दबिस्तान मेरठ’ के भव्य लोकार्पण समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि डॉ. यूनुस ग़ाज़ी का अध्ययन तो व्यापक है ही, लेकिन उनका अवलोकन भी अद्भुत है और ये सभी विशेषताएँ उन्हें एक सशक्त एवं समर्थ कवि सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ मुहम्मद नदीम ने पवित्र कुरआन के पाठ से किया। इसके बाद फ़रहत अख़्तर ने अपनी मधुर आवाज़ में डॉ. यूनुस ग़ाज़ी की नात प्रस्तुत कर समाँ बाँध दिया। अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ भेंट कर किया गया।


कार्यक्रम की अध्यक्षता  प्रो. असलम जमशेदपुरी ने की। मुख्य अतिथि के रूप में प्रसिद्ध शायर एवं मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के उर्दू विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर फ़ारूक़ बख़्शी उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथियों के रूप में प्रसिद्ध शिक्षक एवं शायर अनवारुल हक़ शादाँ फलावदी, डॉ. यशिका सागर (अध्यक्ष, उर्दू विभाग, मेरठ कॉलेज), प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता आदिल चौधरी तथा आफ़ाक़ अहमद ख़ाँ उपस्थित रहे। स्वागत भाषण डॉ. आसिफ़ अली ने दिया तथा कार्यक्रम का संचालन डॉ. इरशाद स्यानवी ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अलका वशिष्ठ ने प्रस्तुत किया।


इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए एडवोकेट इरशाद बेताब ने कहा कि यह उर्दू भाषा के प्रति प्रेम और लगाव ही है, जिसके कारण आज मुझे उर्दू की इतनी बड़ी हस्तियों के साथ संवाद करने का अवसर मिल रहा है। मैं काफी समय से ग़ाज़ी सर के संपर्क में हूँ। मैं हृदय की गहराइयों से उनका आभार व्यक्त करता हूँ कि उन्होंने मुझे अपनी पुस्तक में स्थान दिया और पुस्तक मुझे समर्पित भी की। मैं यूनुस ग़ाज़ी को हार्दिक बधाई देता हूँ।


ज़ीशान कुरैशी ने कहा कि आज यूनुस ग़ाज़ी साहब की दो पुस्तकों का लोकार्पण हुआ है। मैं केवल इतना कहना चाहूँगा कि जिस दिन से प्रो. असलम जमशेदपुरी मेरठ आए हैं, उर्दू के क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं और आशा है कि भविष्य में भी यह सिलसिला जारी रहेगा। यूनुस ग़ाज़ी साहब को बहुत-बहुत बधाई। उनके शिष्यों की संख्या भी बहुत अधिक है, जो उनके नाम और कार्य को आगे बढ़ाएँगे। डॉ. शादाब अलीम ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि यूनुस ग़ाज़ी एक शालीन एवं सुसंस्कृत इंसान, स्नेही शिक्षक और अच्छे साहित्यकार हैं। उन्होंने गद्य और पद्य दोनों क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है और दोनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। कुछ विषय भले ही पुराने प्रतीत होते हों, लेकिन उन्होंने अपनी विलक्षण कल्पनाशक्ति के माध्यम से उन्हें नवीन और अनूठा बना दिया है। यही उनका एक बड़ा साहित्यिक योगदान है।


प्रसिद्ध पत्रकार शाहिद चौधरी ने कहा कि डॉ. यूनुस ग़ाज़ी में भी फ़रहाद की तरह पहाड़ों को काटकर नहर निकालने का साहस और संकल्प है। लोकार्पित पुस्तकें उनकी इसी दृढ़ता, मेहनत और प्रयास का परिणाम हैं। उन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया है। दबिस्तान-ए-मेरठ के जो शायर समय की धूल भरी परतों में गुम हो गए थे, उन्हें उनके जन्म एवं मृत्यु-वर्ष, काव्य-शैली और साहित्यिक सेवाओं के साथ सामने लाना और वह भी क़त्आत के रूप में, निश्चित रूप से प्रशंसनीय और सराहनीय कार्य है। ‘शुअरा-ए-दबिस्ताने मेरठ’ एक सफल प्रयास और अनमोल उपहार है, जो हमें याद दिलाता है कि हमारे पूर्वज हमारे लिए कितनी मूल्यवान साहित्यिक विरासत छोड़ गए हैं।


आफ़ाक़ अहमद ख़ाँ ने कहा कि आज का यह समारोह एक यादगार समारोह है। आज जो पीढ़ी यहाँ बैठी है, वह आगे चलकर गर्व करेगी कि हमने प्रोफेसर फ़ारूक़ बख़्शी को देखा था, प्रोफेसर यूनुस ग़ाज़ी की शायरी सुनी थी और प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी से मुलाकात की थी। यूनुस ग़ाज़ी की ग़ज़लें विद्यालयों में बच्चे पढ़ते हैं। मेरठ को ‘दबिस्तान’ का दर्जा दिलाने के अभियान में हमें प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी का हर स्तर पर सहयोग करना चाहिए और इस स्वप्न को साकार करना चाहिए।


डॉ. यशिका सागर ने कहा कि मैं आपकी बेटी के समान हूँ। सर ने बहुत अच्छे ढंग से मेरा मार्गदर्शन और प्रशिक्षण किया। आपने सदैव बिना किसी स्वार्थ के उर्दू साहित्य की सेवा की है। आप न केवल एक अच्छे शिक्षक, कवि, शोधकर्ता और आलोचक हैं, बल्कि एक शालीन, विनम्र, उदार और मानवतावादी व्यक्तित्व के धनी हैं। मैं आपको हृदय से बधाई देती हूँ और आपकी दीर्घायु एवं उत्तम स्वास्थ्य की कामना करती हूँ। आप भविष्य में भी इसी प्रकार उर्दू साहित्य की सेवा करते रहें।


उस्ताद शायर अनवारुल हक़ शादाँ ने कहा कि आप केवल शायर ही नहीं, बल्कि विचारक, आलोचक और शोधकर्ता भी हैं। आपने साहित्य की उत्कृष्ट सेवा की है। जिस उम्र में लोग थक जाते हैं, उस उम्र में भी आप किसी युवा की तरह साहित्यिक कार्यों में सक्रिय हैं। मेरी हृदय से कामना है कि आप साहित्य के आकाश पर इसी प्रकार चमकते रहें।


आदिल चौधरी ने कहा कि मैं प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी का आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने उर्दू के प्रचार-प्रसार के लिए उल्लेखनीय कार्य किए और हम जैसे लोगों को भी प्रेरित किया। आज हम भी आपके पदचिह्नों पर चलने का प्रयास कर रहे हैं और हर महीने अपने यहाँ कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। भविष्य में भी, इंशाअल्लाह, यह सिलसिला जारी रहेगा। मैं यहाँ उपस्थित सभी अतिथियों—प्रोफेसर फ़ारूक़ बख़्शी, डॉ. यूनुस ग़ाज़ी तथा अन्य सभी महानुभावों—का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।


अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने कहा कि आज का दिन एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक क्षण है। जिस स्वप्न को हमने इस शहर के लिए देखा था, अब उसकी परिणति सामने आने लगी है। मेरठ एक प्राचीन शहर है। हमने मेरठ को ‘दबिस्तान’ के रूप में स्थापित करने का संकल्प लिया है। यहाँ कहानीकार, उपन्यासकार, स्तंभकार, व्यंग्यकार, हास्य लेखक और शोधकर्ता आदि अनेक प्रकार के साहित्यकार हुए हैं, लेकिन कोई प्रमुख आलोचक नहीं हुआ। इसी कारण मेरठ को वह स्थान नहीं मिल सका जिसका वह अधिकारी था।


उन्होंने कहा कि हम लगातार प्रयास कर रहे हैं। हमने मेरठ के शायरों और साहित्यकारों पर एम.फिल. का शोधकार्य कराया है और अब साहित्यिक पत्रिकाओं के विशेषांक प्रकाशित करने हैं। ‘दबिस्तान-ए-मेरठ’ (शायरी) प्रकाशित हो चुका है। दो-चार महीने में गद्य विशेषांक प्रकाशित होगा और उसके बाद ‘मशाहिर-ए-मेरठ’ प्रकाशित करने की योजना है। हम निरंतर प्रयास करते रहेंगे।


उन्होंने कहा कि प्रोफेसर यूनुस ग़ाज़ी ने ऐतिहासिक कार्य किया है। उन्होंने ऐसे शायरों का उल्लेख किया है, जो गुमनामी का हिस्सा बन चुके थे। इसी प्रकार उन्होंने हम्दिया संग्रह लिखकर भी एक बड़ा साहित्यिक कार्य किया है। उर्दू साहित्य में हम्दिया संग्रह बहुत कम हैं।


उन्होंने कहा कि मेरा उद्देश्य केवल इतना है कि मेरठ उर्दू के संदर्भ में सदैव जीवंत रहे और साहित्य के आकाश पर मेरठ का नाम पूरी चमक के साथ प्रकाशित हो। अभी हमारे स्वप्न की पूर्ण परिणति शेष है। आप सभी के सहयोग की आवश्यकता है। इंशाअल्लाह, हमारा उद्देश्य अवश्य पूरा होगा।


कार्यक्रम में डॉ. मुफ़्ती मुहम्मद रिज़वान, मौलाना सैयद नायाबुद्दीन नायाब, प्रोफेसर हुमा मसूद, डॉ. फ़रहत ख़ातून, डॉ. नवेद ख़ान, डॉ. शबिस्ताँ आस मुहम्मद, नज़ीर मेरठी, सैयदा मरियम इलाही, साइमा, सरताज जहाँ, मुहम्मद ईसा राना, मुहम्मद फ़ैज़ान, मुहम्मद हारून, मुहम्मद फ़रमान, मुहम्मद नईम, मुहम्मद जलीस, फ़ैयाज़ हसन, मुहम्मद फ़ैज़ सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ और शहर के गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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