सपना सी.पी. साहू
नित्य संदेश, इंदौर। यात्राएं हमारे जीवन, अनुभव और सोच को विस्तार और गहराई देती है। यात्राओं से मिली सीख हमारी स्मृतियों में संचित रह जाती है। विश्व पर्यटन दिवस 27 सितंबर को आता है। वामा साहित्य मंच ने इस दिवस को आभासीय गोष्ठी के रूप में मनाया।
मंच द्वारा 'यात्रा संस्मरण' विधा के साथ 'वो मेरी यादगार यात्रा' विषय पर आभासीय गोष्ठी सफलतापूर्वक संपन्न हुई।
ख़ास बात यह रही कि इसमें इंदौर शहर से बाहर रहने वाली सदस्यों को अभिव्यक्ति की प्राथमिकता दी गई और गोष्ठी संचालन, संयोजन और तकनीकी सहयोग भी शहर के बाहर रहने वाली सदस्यों ने ही निभाया।
गोष्ठी का आरंभ रंजना जोशी (खंडवा) द्वारा प्रस्तुत मधुर सरस्वती वंदना से हुआ। मंच की अध्यक्ष ज्योति जैन ने सभी का स्वागत करते हुए जीवन को एक यात्रा कहा जिसमें हम सभी यात्री किसी निश्चित गंतव्य की तरफ जा रहे हैं उनके अनुसार जब हम एक स्थान से दूसरे स्थान जाते हैं तो भाषा, बोली,संस्कृति और रहन सहन को भी लेकर जाते हैं और वहां से भी यही सब लेकर अपने शहर लौटते हैं।
जयपुर की वरिष्ठ साहित्यकार मनीषा कुलश्रेष्ठ मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं।रचनाकार मनीषा जी अपने यात्रा संस्मरणों के साथ साहित्य संसार में एक विशिष्ट स्थान रखती हैं।
अपनी किताब 'घुमक्कड़ी' और 'होना अतिथि कैलाश का' में उन्होंने यात्राओं का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया है।
उन्होंने कहा कि यात्राओं में लेखन को परतें मिलती हैं और यात्राएं आपके लेखन को समृद्ध करती हैं,यात्रा वृत्तांत एक दूसरे को आपस में जोड़ते हैं.दो बड़े या नामी शहर लिए की यात्रा पर्यटन नहीं बल्कि उन दो शहरों के बीच की यात्रा होती है जहां हम छोटे छोटे बिंदुओं से रूबरू होते हैं। यात्राएं हमें जीवन के प्रति आशावादी बनाती हैं। उन्होंने प्रतिभागियों को संस्मरण लेखन में जमीन से जुड़े रह कर, सामान्य बातों से बचने व रोचक जानकारी और स्थान से जुड़े महान लेखकों, चित्र कारों और इतिहास को प्रभावी भाषा में शामिल करने का सुझाव दिया।
इस आभासीय मंच पर प्रवासी व अप्रवासी साहित्यकारों ने अपनी देश-विदेश की यात्राओं के अविस्मरणीय अनुभव और संस्मरण साझा किए। प्रतिभागियों में रूपाली पाटनी (सूरत) ने 'वह अविस्मरणीय रेल यात्रा', सोनल शर्मा (सिंगापुर) ने कैलाश मानसरोवर, डॉ. रेखा मण्डलोई ने 'अस्मरणीय यूएस यात्रा', अंजू निगम (लखनऊ) ने 'लखनऊ की सरज़मीं', सुधा पन्ड्या (वडोदरा) ने 'मेरी मिस्र यात्रा', सोनू यशराज (वडोदरा) ने 'नर्मदा तीरे बसा महेश्वर', चंद्रकला जैन ने 'एक संस्मरण वैनकूवर के नाम' तथा डॉ. सारिका सिंघानिया (रायपुर) ने 'सफेद नीली स्मृतियों का संसार ग्रीस' सुधा व्यास (खंडवा) ने जर्मनी की रेखा भाटिया (अमेरिका)ने लूसर्न कहें या लूज़र्न शीर्षक से यात्रा के संस्मरण सुनाए। सभी के मनमोहक संस्मरणों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
संचालन उज्जैन से शैली बक्षी खड़कोतकर ने कुशलतापूर्वक संभाला और तकनीकी सहयोग रूपाली पाटनी ने प्रदान किया। कार्यक्रम का सफल संयोजन एवं आभार प्रदर्शन अंजू निगम द्वारा किया गया। गोष्ठी में बड़ी संख्या में देश-विदेश की वामा सखियों ने उपस्थिति दर्ज की। सम्मिलित संस्मरणों को लिपिबद्ध करने का सुझाव भी अतिथि द्वारा दिया गया जिसका अध्यक्षा ने सहर्ष स्वागत किया।

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