Monday, September 14, 2026

किसी भी भाषा का कोई धर्म नहीं होता : प्रो. असलम जमशेदपुरी

उर्दू विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में ‘हिंदी दिवस’ पर कार्यक्रम आयोजित

नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। सभी छात्र-छात्राओं को हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ। हिंदी और उर्दू दो भाषाएँ होते हुए भी एक हैं। लगभग सभी भाषाओं में दूसरी भाषाओं के शब्द बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। समाज और परिवेश के शब्द जब तक किसी भाषा में शामिल नहीं होंगे, तब तक हम अपने दिल की बात भी नहीं कह पाएँगे। सपने अपनी भाषा में ही देखे जाते हैं।


ये विचार प्रो. असलम जमशेदपुरी ने उर्दू विभाग के प्रेमचंद सेमिनार हॉल में आयोजित ‘हिंदी दिवस’ कार्यक्रम में अपने अध्यक्षीय संबोधन के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि हिंदी और उर्दू में बहुत-सी समानताएँ हैं। दोनों की व्याकरण एक जैसी है, स्वभाव एक जैसा है और मुहावरे भी एक जैसे हैं। दोनों भाषाओं में सबसे बड़ा अंतर उनकी लिपि का है। चूँकि हिंदी संस्कृत से निकली है, इसलिए इसकी लिपि देवनागरी है, जबकि उर्दू पर अरबी और फ़ारसी के प्रभाव अधिक हैं, इसलिए इसकी लिपि फ़ारसी है। यदि लिपि का अंतर समाप्त हो जाए तो दोनों भाषाएँ एक जैसी ही दिखाई देंगी। उन्होंने कहा कि उर्दू समाचार-पत्रों में हिंदी के बहुत-से शब्द मिल जाते हैं। इसी प्रकार हिंदी समाचार-पत्र भी उर्दू के शब्दों से खाली नहीं हैं। दोनों भाषाओं के बहुत-से वाक्य भी एक जैसे होते हैं। भाषाएँ दो संस्कृतियों और सभ्यताओं को जोड़ने का कार्य करती हैं। राजनीति ने उर्दू को मुसलमानों और हिंदी को हिंदुओं से जोड़ दिया, जबकि किसी भी भाषा का कोई धर्म नहीं होता। हमारी जिम्मेदारी है कि हिंदी भाषा को अधिक से अधिक बढ़ावा दें।


इससे पहले कार्यक्रम का शुभारंभ सईद अहमद सहारनपुरी ने पवित्र कुरआन की तिलावत से किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. असलम जमशेदपुरी ने की। सम्मानित अतिथि के रूप में कनाडा से पधारीं कौसर आफाक ने कार्यक्रम में भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अलका वशिष्ठ ने किया। इस अवसर पर फरहत अख्तर ने अपनी मधुर आवाज में ग़ज़ल प्रस्तुत की। मुहम्मद ईसा राना, महविश और मुहम्मद नदीम ने हिंदी भाषा के महत्व पर प्रकाश डाला। मुहम्मद ईसा राना ने अपना शोध-पत्र प्रस्तुत करते हुए कहा कि आज यहाँ खड़े होकर हिंदी की बात करना हमारे लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि हम उर्दू के विद्यार्थी हैं। शायद किसी के मन में यह सवाल आए कि उर्दू का विद्यार्थी होकर हिंदी दिवस पर हिंदी के संबंध में बात क्यों? तो मेरा उत्तर बहुत स्पष्ट है कि हमें भाषाओं के बीच प्रतिस्पर्धा से बचना चाहिए, बल्कि एक-दूसरे का सहयात्री बनना चाहिए।


उन्होंने कहा कि उर्दू पढ़ने का अर्थ हरगिज़ हिंदी से दूरी बनाना नहीं है और हिंदी से प्रेम करना उर्दू से बेवफाई नहीं है। क्योंकि भाषा किसी एक व्यक्ति, जाति या समुदाय की जागीर नहीं होती। भाषा पर सभी का अधिकार होता है। हिंदी इसी मिट्टी और इसी समाज की आवाज है, जिसमें हम रहते हैं। उन्होंने आगे कहा कि मैं केवल इतना कहना चाहूँगा कि यदि हिंदी को उन्नति के शिखर पर ले जाना है तो ऐसा नहीं होना चाहिए कि केवल हिंदी दिवस पर बड़ी-बड़ी बातें करें, भाषण दें और मंच सजाएँ, बल्कि हिंदी को अपने व्यावहारिक जीवन में स्थान देना होगा। कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. इरशाद स्यानवी ने कहा कि हिंदी दिवस के इस शुभ अवसर पर मैं हिंदी और उर्दू पढ़ने वाले सभी लोगों को बधाई देता हूँ, क्योंकि हिंदी के साथ उर्दू और उर्दू के साथ हिंदी का प्राचीन संबंध रहा है। आरंभ से ही हमारे बुजुर्गों, साहित्यकारों और कवियों ने हिंदी और उर्दू को एक-दूसरे के करीब लाने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि अमीर खुसरो ने अपनी कविता और रचनाओं में हिंदी का भरपूर प्रयोग किया है। गांधी जी इंग्लैंड जाकर वकालत की पढ़ाई करके आए, लेकिन भारत लौटने के बाद अपने सभी कार्य हिंदी भाषा में ही करते थे और उर्दू में हस्ताक्षर करते थे। इसी प्रकार अन्य साहित्यकारों और कवियों ने भी हिंदी और उर्दू के पारस्परिक संबंध को बढ़ावा देने के सफल प्रयास किए हैं।


डॉ. शादाब अलीम ने कहा कि आज उर्दू विभाग हिंदी दिवस मना रहा है। उर्दू हो या हिंदी, दोनों भाषाएँ खड़ी बोली से निकली हैं और दोनों बहनों के समान हैं। हिंदी और उर्दू एक ऐसी माला में पिरोए हुए मोतियों के समान हैं, जिन्हें अलग नहीं किया जा सकता। दोनों की व्याकरण एक है। दोनों भाषाओं की कार्यप्रणाली भी एक ही है। उन्होंने कहा कि हिंदी हमारी साझा संस्कृति की प्रतीक है। भाषा पर सभी का अधिकार होता है और जो भाषा दूसरी भाषाओं को अपने भीतर समाहित करने की क्षमता रखती है, वह निश्चित रूप से बड़ी और समृद्ध भाषा होती है। हम सभी की जिम्मेदारी है कि उर्दू के साथ-साथ हिंदी के विकास के लिए भी कार्य करें। दोनों भाषाओं की रक्षा करें और उन्हें आगे बढ़ाएँ।


विभाग के शिक्षक डॉ. आसिफ अली ने हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि हिंदी और उर्दू दोनों भाषाएँ एक-दूसरे के बहुत करीब हैं। लेकिन आरंभ से ही यह विरोधाभास बना हुआ है कि बहुत-से लोग उर्दू भाषा को मुसलमानों की भाषा समझते हैं, जबकि हिंदी और उर्दू दोनों भाषाएँ यहीं पैदा हुई हैं। हिंदी की तरह उर्दू भी हिंदू और मुसलमान सभी बोलते हैं और हर जगह हिंदी और उर्दू भाषाओं का प्रयोग हो रहा है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।

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