Tuesday, August 25, 2026

कांक्रोच...की सोच —ओमप्रकाश कुन्तल

 
नित्य संदेश

"कांक्रोच...की सोच"

विलायती कैंकडों की सह पर

कांक्रोंच थे पहुँचे जंतर-मंतर।

'मोदी' जी काला हिट छिडके

उनकी सोच में आया अंतर।।


गाँवों  के  स्कूल  में पहुंचे,

चैक  करन  धाये.. भीतर।

गाँव वालों  ने  मारा घेर-घेर

उडा..  दिये   उनके  तीतर।।


नया  आदेश  हुआ जारी,

बिनु  आज्ञा  ना स्कूल  घुसें।

जो  ना  मानेगा, पिटे अलग

जेल सलाखों.. के बीच  ठुसे।।


कानून  पता  होने पर भी

जो   'बवालात'  को चाहेगा।

100 नंबर  पर होगा  डायल

वो   'हवालात'  में जायेगा।।


तुम  कीडे हो, थोडी  बुद्धि

जितनी  भी,  जोर जरा देना।

हालातों  से  बचके चलना,

कानून  हाथ  में मत  लेना।।


कहैं'कुन्तल'कवि कांक्रोचों से

काहे  को  पिटते.. मिटते हो।

तुम घरों में रहे, रहो  घर  में

अपने  घर से क्यों डिगते हो।।



—ओमप्रकाश कुन्तल

पूर्व सैनिक एवं प्राध्यापक

हास्य एवं व्यंग्य कवि

No comments:

Post a Comment