जेन -जी और जेन -अल्फा जैसी पीढ़ीगत श्रेणियां मुख्यत: पश्चिमी सामाजिक विज्ञान की अवधारणाओं से विकसित हुई है। भारतीय संदर्भ में व्यक्ति की पहचान केवल उसकी पीढ़ी से नहीं, बल्कि उसके अनुशासन, संस्कार, कर्तव्य बोध, पुरुषार्थ, सामाजिक उत्तरदायित्व और पीढ़ियों से प्राप्त सांस्कृतिक मूल्यों से निर्धारित होती है। पश्चिमी समाजशास्त्रीय चिंतन में पीढ़ी को सामाजिक विश्लेषण की एक महत्वपूर्ण श्रेणी के रूप में समझने का प्रयास कार्ल माहेम ने अपने प्रसिद्ध निबंध 'द प्रॉब्लम ऑफ़ जनरेशन ' में किया था। अतः भारतीय समाज में पीढ़ीगत पहचान को समझते समय पश्चिम अवधारणाओं के साथ-साथ भारतीय सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भों को भी ध्यान में रखना अति आवश्यक है।
युवाओं का सरकार की नीतियों से असहमति रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है। शासकीय संस्थाओं और सरकार की नीतियों की तथ्यों के आधार पर आलोचना करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है । शांतिपूर्ण और मर्यादित विरोध स्वस्थ लोकतांत्रिक संस्कृति को सुदृढ़ करता है।
जेन -जी को शिक्षा में सुधार, रोजगार,अवसर और अन्य लोकहित के मुद्दों पर रचनात्मक विरोध को प्राथमिकता देनी चाहिए। मंत्रियों या राजनीतिक व्यक्तियों का विरोध राजनीतिक गतिविधि का हिस्सा हो सकता है ,जबकि किसी नीति या समस्या के विरोध का उद्देश्य "व्यवस्था में सुधार लाना होना चाहिए।"
युवाओं की राजनीतिक भागीदारी भी लोकतंत्र के लिए सकारात्मक है।बशर्ते वह तथ्य,संवाद और संवैधानिक मर्यादाओं पर आधारित हों। मुद्दों पर केंद्रित रचनात्मक विरोध भारतीय लोकतांत्रिक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।
युवा भारत का भविष्य है। नई पीढ़ी के विचारों, अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को समझने के लिए समाज,सरकार और युवाओं के बीच "निरंतर संवाद" आवश्यक है। नागरिकों को सरकार की नीतियों और कार्य प्रणाली की आलोचना करने का संवैधानिक अधिकार है,यही अधिकार और जिम्मेदारी मिलकर लोकतंत्र को समावेशी, सहभागी, उत्तरदाई एवं जिम्मेदार बनाते हैं।
भारत का संविधान इस भू-भाग की सर्वोच्च विधि है और सरकारों के लिए मार्गदर्शक का कार्य करता है। संविधान के अनुच्छेद 19(1 )(ए) के तहत हर नागरिक को विचार, अभिव्यक्ति और अपने विचार रखने की स्वतंत्रता है, हालांकि लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में यह अधिकार परम नहीं है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(2 ) के अंतर्गत सार्वजनिक व्यवस्था, राज्य की सुरक्षा, नैतिकता एवं राष्ट्रीय हित के संरक्षण के लिए " युक्तियुक्त प्रतिबंध " लगाएं जा सकते हैं। युवाओं का आंदोलन शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए प्रासंगिक है तो आंदोलन उचित है। "शिक्षा व्यवस्था में अपेक्षित सुधार हो रहे हैं तो जन भावनाओं के अनुरूप है।"
भारत का स्वतंत्रता संघर्ष शांतिपूर्ण जन आंदोलन की शक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण रहा है। आद्य सरसंचालक पूजनीय डॉ.केशव बलिराम हेडगेवार जी ने अहिंसा एवं लोकतांत्रिक संवाद के माध्यम से जन भागीदारी को व्यापक स्वरूप दिया। पूजनीय केशव बलिराम हेडगेवार जी और द्वितीय सरसंघ चालक पूजनीय गुरु जी ने लोकतांत्रिक संवाद और शांतिपूर्ण तरीकों के माध्यम से अपने विचारों, मूल्यों और आदर्शों को कार्यकर्ताओं तक संप्रेषित किए।
आपातकाल भारतीय लोकतांत्रिक संस्कृति और संसदीय इतिहास का "काला अध्याय" माना जाता है। उस दौर में तत्कालीन सरसंघचालक और सर- कार्यवाह के नेतृत्व में "लोकतांत्रिक एवं अहिंसक तरीकों से विरोध किया गया।" इस प्रकार भारत में शांतिपूर्ण विरोध केवल एक संवैधानिक अधिकार ही नहीं बल्कि, लोकतांत्रिक और ऐतिहासिक विरासत का भी महत्वपूर्ण एवं अभिन्न हिस्सा है।
वैश्विक स्तर पर हुए शोध यह बताते हैं कि अहिंसक आंदोलन के सफल होने की संभावना "अधिक" होती है। समाज वैज्ञानिकों के अनुसार, हिंसक आंदोलन की तुलना में अहिंसक आंदोलन "लगभग दोगुने अधिक सफल होते हैं । " भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी जिन अहिंसक आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिला ,वे प्रभावी, प्रासंगिक और परिरंदायी सिद्ध हुए । विशेष रूप से जिन आंदोलनों को आबादी के लगभग पांच प्रतिशत लोगों का सक्रिय समर्थन मिला, उनकी सफलता की संभावना "काफी अधिक रही।"
लोकतांत्रिक संस्कृति में धरना, प्रदर्शन ,आमरण अनशन, पदयात्रा, मोर्चा ,सत्याग्रह और शांतिपूर्ण जनसभाएं लोकतंत्र के "सुरक्षा कवच "है। यह सभी माध्यम सरकार और जनता के बीच "संवाद का सेतु" बनते हैं तथा सामाजिक असंतोष को हिंसा में बदलने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
लोकतंत्र में असहमति राष्ट्र- विरोधी नहीं होती। स्वस्थ असहमति लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने का प्रभावी माध्यम है। यह सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने और उसकी नीतियों पर लोकतांत्रिक नियंत्रण बनाए रखने का महत्वपूर्ण साधन है। इसलिए, शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से व्यक्त की गई असहमति लोकतंत्र की शक्ति है ,उसकी कमजोरी नहीं।
सत्ता से संबंधित जानकारी विधि- सम्मत और लोकतांत्रिक तरीके से प्राप्त की जा सकती है। संवैधानिक संस्थाओं को निर्धारित प्रक्रियाओं के माध्यम से जानकारी प्राप्त करना नागरिकों का अधिकार है। हाल के समय में भारत की युवा पीढ़ी शिक्षा व्यवस्था की कमियों को लेकर चिंतित दिखाई दे रही थी और उसके भीतर बदलाव की तीव्र आकांक्षा उभर रहे थे। "शिक्षा तंत्र की कमियों को दूर करने के लिए लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण आंदोलन समय की मांग है।"
भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्रीमान नरेंद्र मोदीजी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक पूजनीय डॉ. मोहन भागवतजी भी युवाओं की भागीदारी और उनके विचारों को महत्व देते हुए नीतियों के निर्माण में उनकी सक्रिय भूमिका पर जोर दे रहे हैं। "लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है कि युवा अपनी ऊर्जा और विचारों का प्रयोग रचनात्मक एवं संवैधानिक तरीकों से करें।"
निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि युवा राष्ट्र की सबसे ऊर्जावान शक्ति है। युवाओं को मुख्यधारा से जोड़कर राजनीतिक और प्रशासकीय प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी का अवसर दिया जाना चाहिए, इससे वह सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास में प्रभावी योगदान दे सकेंगे। भारत के युवा अपने कौशल, ऊर्जा और नवाचार के माध्यम से देश के जनसंख्या की लाभांश की उपयोगिता सिद्ध कर रहे हैं ।भारत वैश्विक स्तर पर उभरती एक शक्ति है और 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है। इस लक्ष्य की प्राप्ति में युवाओं की सक्रिय भागीदारी और सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
लेखक
डॉ. बालमुकुंद पांडे
राष्ट्रीय संगठन सचिव
अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना
झंडेवालान, नई दिल्ली।
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