Friday, August 21, 2026

यूपी पुलिस : कानून का राज या जंगल राज? ललिता हत्याकांड से एसएसपी कार्यालय तक - एक घटना के तीन चेहरे


-चोट कैसे लगी .विस्तार से हो घटना का खुलासा -सड़क हादसा या मारपीट

अशोक सोम
नित्य संदेश, मेरठ। उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था को लेकर योगी सरकार की जितनी सराहना होती है, मेरठ में घटी एक घटना ने उसी व्यवस्था पर उतना ही बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। एक तरफ एक बेटी के हत्यारों को सजा दिलाने की मांग है, दूसरी तरफ उस मांग को उठाने वाले युवक के साथ बर्बरता का आरोप है और तीसरी तरफ भीड़ द्वारा एसएसपी कार्यालय में हंगामा। एक घटना के ये तीन चेहरे बता रहे हैं कि न्याय पाने और न्याय देने, दोनों के तरीके पर मंथन जरूरी है।

*विवाद की जड़ : ललिता गौतम हत्याकांड*
इस पूरे बवाल की जड़ में 15 मई की एक घटना है। टीपी नगर निवासी बीए की छात्रा ललिता गौतम परीक्षा देने के लिए घर से निकली और वापस नहीं लौटी। 17 मई को उसका शव रोहटा क्षेत्र में मिला। पुलिस ने इस मामले में कुछ आरोपियों को गिरफ्तार किया, लेकिन परिवार और समाज के लोगों का आरोप है कि इस हत्याकांड के कुछ मुख्य आरोपी अभी भी खुलेआम घूम रहे हैं।

इसी को लेकर भारतीय किसान यूनियन (अंबेडकर) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. दिग्विजय भाटी और जिलाध्यक्ष मोहित जाटव ने कलेक्ट्रेट और एसएसपी कार्यालय पर धरना-प्रदर्शन किया। उनकी मांग थी कि बाकी बचे आरोपियों पर भी सख्त कार्रवाई हो। आरोप है कि तभी से पुलिस और भाटी पक्ष के बीच तनातनी चल रही थी।

*19 अगस्त को एसएसपी दफ्तर में क्या हुआ?*
19 अगस्त को भाटी और जाटव उसी मामले में शेष आरोपियों पर कार्रवाई की मांग को लेकर एसएसपी मेरठ से मिलने पहुंचे थे। यहीं से दो कहानियां शुरू होती हैं।

*पहली कहानी - पीड़ित की जुबानी बर्बरता की दास्तान*
भाटी का आरोप है कि एसएसपी ने उन्हें चैंबर में बुलाया, गाली-गलौज की और फिर एसओजी दफ्तर ले जाया गया। वहां फिल्मी गानों पर नाचने के लिए कहा गया। मना करने पर बेरहमी से पीटा गया। वायरल वीडियो में भाटी की आंख और छाती पर गहरी चोट के निशान हैं और वह फूट-फूटकर रो रहा है। प्रथम दृष्टया ये निशान सड़क पर स्कूटी से फिसलकर गिरने के नहीं लगते। कोई भी आम आदमी देखकर कहेगा कि यह सड़क हादसे की चोट नहीं, बल्कि पिटाई की चोट है। यदि यह सच है तो यह सिर्फ मारपीट नहीं, बल्कि वर्दी के दुरुपयोग का गंभीर मामला है।

*दूसरी कहानी - पुलिस की थ्योरी और उसके विरोधाभास*
पुलिस का दावा बिल्कुल अलग है। पुलिस कह रही है कि कोई मारपीट नहीं हुई है। चोट स्कूटी से फिसलने से लगी है। साथ ही पुलिस ने यह भी जोड़ा कि दोनों युवक हिस्ट्रीशीटर हैं - दिग्विजय पर 10 और मोहित पर 7 मुकदमे हैं।

यहीं पर पुलिस की थ्योरी खुद ही कटघरे में खड़ी हो जाती है। पुलिस से तीन सीधे सवाल पूछे जाने चाहिए। पहला, यदि चोट स्कूटी हादसे से लगी है तो पुलिस हिस्ट्रीशीटर की कहानी क्यों बता रही है? क्या सड़क हादसा भी देखकर होता है कि सामने वाला हिस्ट्रीशीटर है या नहीं? हादसे का किसी के आपराधिक इतिहास से क्या लेना-देना है?

दूसरा, एडीजी मेरठ जोन भानु भास्कर कह रहे हैं कि एसएसपी कार्यालय में वाद-विवाद हुआ और हिंसा हुई, जबकि एसएसपी कह रहे हैं कि कोई हिंसा नहीं हुई। जब जोन के सबसे बड़े अधिकारी और जिले के कप्तान के बयान ही आपस में नहीं मिलते तो सच्चाई क्या है?

*तीसरी कहानी - आंदोलन का तरीका और भीड़ का हंगामा*
इस घटना का तीसरा चेहरा सबसे ज्यादा चिंताजनक है। जानकारी के अनुसार पीड़ित के समर्थन में जो भीड़ एसएसपी कार्यालय आई, उसने कानून की लेशमात्र भी परवाह नहीं की। कार्यालय परिसर में नारेबाजी, धक्का-मुक्की और हंगामा किया गया। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि एसएसपी को खुद मौके पर पहुंचकर बल प्रयोग कर भीड़ को खदेड़ना पड़ा।

यहां सवाल आंदोलनकारियों से भी है। न्याय पाना हर किसी का अधिकार है, लेकिन न्याय पाने के लिए आंदोलन का तरीका क्या होना चाहिए? आंदोलन हिंसक और जातिवादी मानसिकता से परिपूर्ण नहीं होना चाहिए। कहीं न कहीं कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अधिकारियों को भी एक्शन लेना पड़ता है। यदि हर कोई भीड़ लेकर एसएसपी कार्यालय में घुसेगा तो कानून का राज कैसे चलेगा?

*योगी पुलिस की छवि पर सवाल*
उत्तर प्रदेश पुलिस ने योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पूरे देश में कानून व्यवस्था की मिसाल कायम की है। दूसरे राज्यों की पुलिस यूपी पुलिस से सीख ले रही है। लेकिन मेरठ पुलिस की यह कार्यशैली उस छवि से बिल्कुल अलग और मनमर्जी वाली लग रही है। इस तरह के प्रकरण से सरकार की छवि धूमिल होती है।

इसलिए अब समय आ गया है कि मुख्यमंत्री अपने गोपनीय विभाग को मजबूत करें और इस मामले की जांच सिर्फ डीआईजी सहारनपुर तक सीमित न रखें। जांच मुख्यमंत्री की निगरानी में होनी चाहिए।

निष्कर्ष साफ है। यदि यह सड़क हादसा है और पुलिस पर झूठा आरोप लगाकर उसे बदनाम किया जा रहा है तो आरोप लगाने वालों पर सबसे सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। और यदि युवक के साथ सच में बर्बरता हुई है और उसे हादसा बताकर पर्दा डाला जा रहा है तो यह उससे भी बड़ा अपराध है और दोषी वर्दीधारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। कानून का राज तभी स्थापित होगा जब दोषी चाहे कोई भी हो, सजा अवश्य .।

-जनपद एक नियम दो -आखिर ऐसा क्यों?
मेरठ पुलिस पर अब सबूत के साथ सवाल उठ रहा है। सवाल है - 80 घंटे तक सड़क जाम करने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं और 4 घंटे न्याय मांगने वालों पर कार्रवाई क्यों?

*क्या हुआ था 80 घंटे वाले धरने में?*
जानकारी के अनुसार मेरठ में 80 घंटे तक लगातार धरना-प्रदर्शन किया गया।
1. मुख्य सड़क पर जाम की स्थिति बनी रही।
2. घंटों तक आमजन को आवागमन में परेशानी हुई।
3. सरकारी कामकाज प्रभावित हुआ।

लेकिन इतने लंबे प्रदर्शन के बाद भी पुलिस ने -
- न तो किसी पर मुकदमा लिखा,
- न किसी को हिरासत में लिया,
- न किसी को हिस्ट्रीशीटर बताया।

पुलिस ने समझा-बुझाकर मामला शांत करा दिया।

*और 4 घंटे वाले धरने में क्या हुआ?*
दूसरी तरफ ललिता गौतम हत्याकांड में पीड़ित पक्ष ने सिर्फ 4 घंटे का प्रदर्शन कर एसएसपी से बाकी आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग की।
आरोप है कि -
1. भीड़ को बल प्रयोग कर खदेड़ दिया गया।
2. दो नेताओं डॉ. दिग्विजय भाटी और मोहित जाटव को एसओजी दफ्तर ले जाया गया।
3. बाद में पुलिस ने कहा - चोट स्कूटी से गिरने से लगी है।
4. और तुरंत बाद दोनों को हिस्ट्रीशीटर बताया गया।

यानी 80 घंटे सड़क जाम पर कोई कार्रवाई नहीं और 4 घंटे धरना देने पर पूरी कार्रवाई।

*भेदभाव क्यों?*
स्थानीय लोगों का कहना है कि 80 घंटे वाला धरना प्रभावशाली वर्ग का था, इसलिए पुलिस ने नरमी बरती। 4 घंटे वाला धरना अनुसूचित समाज से जुड़ा था, इसलिए सख्ती बरती गई।

*कानून क्या कहता है?*
कानून में बिना अनुमति सड़क जाम करना अपराध है, चाहे वह 1 घंटे के लिए हो या 80 घंटे के लिए। तो फिर 80 घंटे जाम पर कार्रवाई क्यों नहीं और 4 घंटे पर क्यों?

योगी सरकार का दावा है कानून सबके लिए एक है। इसलिए मांग है कि दोनों धरनों की वीडियोग्राफी और जीडी की जांच मुख्यमंत्री की निगरानी में हो। यदि दोहरा मापदंड साबित होता है तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो।

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