Friday, August 28, 2026

दरख़्त और दरमियाँ..—डॉ शबनम सुल्ताना

नित्य संदेश 

दरख़्त और दरमियाँ

1. ठुकराया हुआ मौसम भी अहम हो जाता है।

बात जब खुद पे आए, तो वफादारी का पैमाना याद आ जाता है।

भूल जाते हैं लोग अक्सर

सूखा हुआ पौधा बारिश की मोहब्बत से सरसब्ज दरख़्त बन जाता है।


2.  हूं!उदास क्यों?मैं

कि खता नहीं है किसी की।

है! ये हैरत मगर 

जहां देखूं दिखें जात बस आदम की।

मेरे दरख़्त होने पर मुझे शुबहा है 

क्योंकि खींचने लगा हूं मैं शाख से पानी दूसरे की।


3. ये एतमाद मेरा था कि तवाफे यार करते

वो सामने खड़े होते हम निगाहों से प्यार करते।



—डॉ शबनम सुल्ताना 

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