Thursday, August 20, 2026

सामवेद की नवमी कथा का तृतीय दिवस सम्पन्न

नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। शास्त्रीनगर में कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल द्वारा प्रो. सुधाकराचार्य त्रिपाठी की प्रेरणा से आयोजित सामवेद की नवमी कथा के तृतीय दिवस पर सामवेद के सप्तम प्रपाठक के तृतीयार्ध की कथा का वाचन किया गया। कथा का शुभारंभ वैदिक मंत्र 'मा भेम मा श्रमिष्मोग्रस्य सख्ये तव' के साथ हुआ।


आज की कथा में 12 आदित्यों में से इन्द्र और विवस्वान् से सम्बद्ध दिनचर्या का वर्णन किया गया। आज के दिवस के देवता इन्द्र, इन्द्राग्नि, वरुण, विश्वकर्मा, सोम, पूषा, विश्वेदेवा, द्यावापृथ्वी और अग्नि रहे। डॉ. पूनम लखनपाल ने बताया कि 60° से 75° तक इन्द्र और 75° से 90° तक विवस्वान् आदित्य का काल होता है। उन्होंने दोनों आदित्यों का परिचय तथा उनके गणों - ऋषि, यक्ष, गन्धर्व, नाग, राक्षस और अप्सरा के विषय में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि इन्द्र आत्मा का प्रतीक है और यह काल हमारी दिनचर्या में क्रियाशीलता का काल है। इस समय व्यक्ति अपने-अपने कार्यक्षेत्र में सक्रिय रहता है। ऋषिगण इन्द्राग्नी से अन्न के लिए प्रार्थना करते हैं, जिसमें रोटी कमाने और अर्जन करने का भाव निहित है।


कथाव्यास ने कहा - "सम्पदायुक्त, कीर्तिसम्पन्न, सौभाग्यवान् आपके हम अनुगामी बनें। दिनचर्या में सम्पदा, कीर्ति और सौभाग्य के लिए कर्मशील होना अनिवार्य है। श्रम करो श्रमिक की भाँति, जीवन यापन करो राजा की भाँति।" उन्होंने बताया कि इन्द्र के काल में युवावस्था के समान अर्जन करना चाहिए और विवस्वान् के काल में अपनी क्षमताओं को पहचान कर चमकना चाहिए। आत्मा रूप इन्द्र विस्तार, प्रकाश और निर्माण करता है। बुद्धिपूर्वक किए गए श्रम से व्यक्ति का ओज बढ़ता है और सफलता, प्रशंसा, कीर्ति व समृद्धि प्राप्त होती है। अंत में उन्होंने 'अञ्जते, व्यञ्जते...' मंत्र का अर्थ दिन में सूर्य के बारह स्वरूपों की गति के साथ जोड़ते हुए स्पष्ट किया।

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