नित्य संदेश। आज का डिजिटल युग बच्चों के लिए अवसरों का द्वार खोलता है, लेकिन साथ ही एक गंभीर खतरा भी पैदा कर रहा है—डिजिटल यौन शोषण। यह बच्चों के खिलाफ सबसे गंभीर अपराधों में से एक बन चुका है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, गेमिंग ऐप्स और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से अपराधी बच्चों तक आसानी से पहुंच बना रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मेरठ और अमरोहा जैसे जिलों में जनहित फाउंडेशन तथा जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन नेटवर्क के माध्यम से बाल संरक्षण के क्षेत्र में लगातार काम करते हुए हम रोजाना इस समस्या की भयावहता देख रहे हैं।
यह कैसे होता है?
डिजिटल यौन शोषण कई रूपों में सामने आता है। अपराधी सोशल मीडिया, चैट ऐप्स या ऑनलाइन गेम्स पर दोस्ती का नाटक करके बच्चों का विश्वास जीतते हैं (जिसे ग्रूमिंग कहा जाता है)। इसके बाद वे निजी तस्वीरें या वीडियो मांगते हैं, धमकी देते हैं या भावनात्मक दबाव बनाते हैं। कई मामलों में ऑफलाइन शोषण की रिकॉर्डिंग ऑनलाइन फैलाई या इस्तेमाल की जाती है। सेक्सटॉर्शन (धोखाधड़ी से धन या और सामग्री की मांग), बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) का निर्माण, संग्रहण, आदान-प्रदान और बिक्री आम हो गई है। हाल के वर्षों में AI से बने या मॉर्फ किए गए कंटेंट भी चुनौती बन रहे हैं।
भारत में नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉयटेड चिल्ड्रन (NCMEC) जैसे स्रोतों से लाखों साइबर-टिप रिपोर्ट्स आ रही हैं। सोशल मीडिया से टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर सामग्री का प्रवाह देखा गया है। लॉकडाउन के दौरान और इंटरनेट पहुंच बढ़ने के साथ यह समस्या और बढ़ी है। बच्चे अक्सर अनजाने में या दबाव में फंस जाते हैं, क्योंकि अपराधी उनकी उम्र, अकेलेपन या जिज्ञासा का फायदा उठाते हैं।
अपराधी इससे कैसे फायदा उठाते हैं?
इंटरनेट की गुमनामी, एन्क्रिप्शन और तेज प्रसार अपराधियों को सुरक्षा कवच प्रदान करता है। वे सामग्री बेचकर पैसे कमाते हैं, शक्ति और नियंत्रण का अहसास पाते हैं, तथा नेटवर्क बनाकर और बच्चों को निशाना बनाते हैं। कुछ मामलों में परिवार के सदस्यों या परिचितों द्वारा भी सामग्री बनाई और फैलाई जाती है। मांग और आपूर्ति का यह चक्र अपराध को बढ़ावा देता है। भारत में CSAM से संबंधित रिपोर्ट्स में वृद्धि दर्ज की गई है, जो दर्शाता है कि यह समस्या स्थानीय स्तर पर भी गंभीर है।
कानूनी प्रावधान और हालिया विकास
भारत में POCSO अधिनियम, 2012 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67B इस अपराध को सख्ती से अपराध मानते हैं। बाल यौन शोषण सामग्री का निर्माण, प्रकाशन, ट्रांसमिशन, संग्रहण, डाउनलोडिंग, विज्ञापन या वितरण दंडनीय है। सुप्रीम कोर्ट ने जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस बनाम एस. हरिश (2024) मामले में स्पष्ट किया कि ऐसी सामग्री को देखना या स्टोर करना भी कुछ परिस्थितियों में अपराध हो सकता है, खासकर यदि साझा करने या व्यावसायिक लाभ का इरादा हो। POCSO में डिजिटल/कंप्यूटर-जनरेटेड इमेज को भी शामिल किया गया है। साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (cybercrime.gov.in) और चाइल्डलाइन 1098 महत्वपूर्ण उपकरण हैं। फिर भी, एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म्स, विदेशी सर्वर्स और रिपोर्टिंग में देरी चुनौतियां बनी हुई हैं। सोशल मीडिया कंपनियों की सक्रिय भूमिका और अनिवार्य रिपोर्टिंग पर जोर दिया जा रहा है।
कैसे लगाई जा सकती है लगाम?
जागरूकता और शिक्षा: स्कूलों, परिवारों और समुदायों में डिजिटल सुरक्षा की शिक्षा अनिवार्य हो। बच्चों को सिखाया जाए कि अजनबी लोगों से किसी भी प्रकार की कोई निजी जानकारी या तस्वीरें न साझा करें, और किसी भी प्रकार के दबाव की सूचना तुरंत दें परिजनों को दे। माता-पिता को निगरानी, पेरेंटल कंट्रोल और खुली बातचीत की आदत डालनी चाहिए।
रिपोर्टिंग और त्वरित कार्रवाई: संदेह होने पर तुरंत cybercrime.gov.in, 1098 (चाइल्डलाइन), स्थानीय पुलिस या SJPU को रिपोर्ट करें। जनहित फाउंडेशन मेरठ में और अमरोहा सहित पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन नेटवर्क के सहयोग से बचाव और जागरूकता अभियान चल रहे हैं।
तकनीकी और कानूनी मजबूती: प्लेटफॉर्म्स को प्रोएक्टिव डिटेक्शन, त्वरित हटाने और भारतीय एजेंसियों को रिपोर्ट करने के लिए बाध्य किया जाए। पुलिस और न्यायिक अधिकारियों का साइबर फॉरेंसिक प्रशिक्षण बढ़ाया जाए। AI-जनित सामग्री पर भी सख्ती जारी रहे।
समुदाय और प्रशासन का सहयोग: आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, शिक्षक, स्थानीय प्रशासन और NGO मिलकर सर्विलांस बढ़ाएं। बाल विवाह, बाल श्रम और ट्रैफिकिंग से जुड़े डिजिटल खतरों पर भी नजर रखें। उत्तर प्रदेश सरकार के बाल संरक्षण प्रयासों के साथ मिलकर काम करने से बेहतर परिणाम मिल रहे हैं।
परिवार की भूमिका: मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग पर स्वस्थ सीमाएं, परिवार में भरोसे का माहौल और बच्चों की भावनात्मक जरूरतों पर ध्यान सबसे प्रभावी बचाव है।डिजिटल यौन शोषण केवल कानूनी समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का मुद्दा है। हर माता-पिता, शिक्षक, पड़ोसी और नागरिक को सतर्क रहना होगा। जनहित फाउंडेशन और जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन जैसे संगठनों के माध्यम से हम मेरठ-अमरोहा क्षेत्र में जागरूकता, बचाव और पुनर्वास के काम को आगे बढ़ा रहे हैं। अगर हम आज सक्रिय नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ी इस खतरे की शिकार होती रहेगी। हम पेरेंट्स के साथ भी जागरूकता सेशन कर रहे है। जिसमें परिजनों ने खुल कर अपनी बात को कहा भी है
आइए, मिलकर बच्चों के सुरक्षित डिजिटल भविष्य का निर्माण करें। किसी भी संदिग्ध घटना की सूचना तुरंत दें—1098 या जेआरसी हेल्पलाइन 18001027222 पर कॉल करके या cybercrime.gov.in पर दर्ज कराएं। बच्चों की सुरक्षा हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।
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